
सुप्रीम कोर्ट का किसानों से सवाल, कृषि कानूनों पर रोक के बाद भी प्रदर्शन क्यों?
क्या है खबर?
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में हुई हिंसा के बाद सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने किसान आंदोलन पर सख्त रुख अपनाया है।
किसान महापंचायत नाम के संगठन द्वारा दिल्ली के जंतर-मंतर पर सत्याग्रह शुरू किए जाने की अनुमति देने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि जब तीन कृषि कानूनों पर फिलहाल रोक लगी हुई है तो फिर किसान सड़कों पर किसके लिए प्रदर्शन कर रहे हैं?
मामला
किसान संगठन ने मांगी थी जंतर-मंतर पर धरने की मंजूरी
किसान महापंचायत नामक एक किसान संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका करते हुए उससे जंतर मंतर पर सत्याग्रह करने की मंजूरी मांगी थी।
संगठन ने कोर्ट से अनुरोध किया था कि वह अधिकारियों को 200 किसानों को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने की अनुमति देने का निर्देश दे।
इस मांग पर जस्टिस एएम खानविलकर और सीटी रवि कुमार की बेंच ने कहा था कि किसानों ने पूरे शहर का दम घोंट दिया है और अब शहर के अंदर आना चाहते हैं।"
सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने किसान संगठनों से पूछे सख्त सवाल
मामले में सोमवार ने सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "जब हमने कृषि कानूनों पर रोक लगा रखी है तो किसान किसके खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं? कार्यपालिका इन विरोध प्रदर्शनों की अनुमति कैसे दे सकती है? इन विरोध प्रदर्शनों की वैधता क्या है?"
कोर्ट ने आगे कहा, "लागू करने के लिए कुछ नहीं है। कृषि कानूनों की वैधता का निर्णय कोर्ट के अलावा कोई नहीं कर सकता। जब किसानों का मामला कोर्ट में लंबित है तो सड़कों पर विरोध क्यों?"
जानकारी
सुप्रीम कोर्ट ने 12 जनवरी को लगाई थी कृषि कानूनों के अमल पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने 12 जनवरी को कृषि कानूनों के अमल पर रोक लगा दी थी। इसके अलावा कोर्ट ने जमीनी स्थिति समझने के लिए चार सदस्यीय समिति का भी गठन किया था तथा उसके मामले की विस्तृत रिपोर्ट कोर्ट को देने को कहा था।
टिप्पणी
न्याय के लिए अदालत को चुनें या फिर सड़क- सुप्रीम कोर्ट
किसान महापंचायत के वकील अजय चौधरी ने कहा कि किसानों का विरोध केवल कृषि कानूनों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वह न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) सहित अन्य मुद्दों की भी मांग कर रहे हैं।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता या तो अदालत में कानून को चुनौती दे सकता है या सड़क पर विरोध कर सकता है। ऐसे में किसान मामले में न्याय के लिए या तो अदालत को चुन लें या फिर सड़क।
मांग
केंद्र सरकार ने की प्रदर्शन की अनुमति नहीं देने की मांग
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने लखीमपुर खीरी हिंसा में हुई आठ लोगों की मौत का हवाला देते हुए कहा कि इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए भविष्य में ऐसे किसी आंदोलन को अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
उन्होंने लखीमपुर खीरी घटना पर दुख जताते हुए कहा कि देश में ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं नहीं होनी चाहिए। ऐसे इसी तरह के सभी प्रदर्शनों पर रोक लगाना जरूरी है।
टिप्पणी
लखीमपुर खीरी जैसी घटनाओं की कोई नहीं लेता जिम्मेदारी- सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने लखीमपुर खीरी में हुई हिंसक घटना पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रदर्शन के दौरान जब किसी की जान जाती है या संपत्ति का नुकसान होता है तो इसकी जिम्मेदारी लेने के लिए कोई आगे नहीं आता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह इस बात का परीक्षण करेगा कि यदि कोई मामला कोर्ट में लंबित है तो क्या उस मामले में आंदोलन भी किया जा सकता हैं। मामले की अगली सुनवाई 21 अक्टूबर को होगी।
सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने पिछली सुनवाई में भी पूछे थे सख्त सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को भी कहा था कि कृषि कानूनों के खिलाफ कोर्ट आने के बाद किसानों को न्यायिक व्यवस्था पर भरोसा करना चाहिए था और उसे मामले का फैसला करने देना चाहिए था।
कोर्ट ने पूछा था, "अगर आपको कोर्ट पर भरोसा है तो प्रदर्शन करने की जगह उसे तत्काल सुनवाई के लिए मनाओ। क्या आप न्यायिक व्यवस्था के खिलाफ भी प्रदर्शन कर रहे हो... क्या यहां के निवासी प्रदर्शन से खुश हैं? ये सब रुकना चाहिए।"
आंदोलन
पिछले साल नवंबर से कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं किसान
गौरतलब है कि किसान केंद्र सरकार के नए कृषि कानूनों के खिलाफ 25 नवंबर, 2020 से दिल्ली बॉर्डर पर धरना दे रहे है। इससे गाजीपुर बॉर्डर, टिकरी बॉर्डर, शाहजहांपुर बॉर्डर सहित कई मार्गों पर ट्रैफिक बंद है।
नोएडा मार्ग के बंद होने से लोगों को 20 मिनट का सफर करने में दो घंटे का समय लग रहा है।
इसी तरह शाहजहांपुर बॉर्डर पर एक तरफ का रास्ता बंद होने से दिल्ली जाने वाले लोगों का सफर लंबा हो गया है।