
#NewsBytesExclusive: प्रीमैच्योर शिशु की देखभाल को लेकर क्या-क्या सावधानियां बरतनी चाहिए? जानिए विशेषज्ञ की राय
क्या है खबर?
प्रीमैच्योर शिशु यानी समय से पहले जन्मा बच्चा।
ऐसे शिशु मां के गर्भ में पर्याप्त समय तक नहीं रह पाते हैं और काफी नाजुक होते हैं, इसलिए जन्म के बाद इन्हें अन्य शिशुओं के मुकाबले अतिरिक्त देखभाल और पोषण की जरूरत होती है।
प्रीमैच्योर शिशु की देखभाल को लेकर क्या-क्या सावधानियां बरतनी चाहिए, इस विषय पर बेहतर जानकारी प्राप्त करने के लिए हमने बाल विशेषज्ञ डॉक्टर जसप्रीत कौर (MBBS, MD) से बातचीत की, जिन्होंने हमें कई महत्वपूर्ण बातें बताईं।
कारण
समय से पहले प्रसव और शिशु के जन्म के कारण
डॉ जसप्रीत ने बताया कि अगर मां की उम्र 20 से कम या 35 से अधिक है तो प्रीमैच्योर शिशु हो सकता है।
यदि पहली प्रेग्नेंसी और दूसरी प्रेग्नेंसी के बीच का अंतराल एक साल से कम या पांच साल से अधिक है तो भी समय से पहले प्रसव हो सकता है।
जुड़वां बच्चे, बच्चेदानी में बैक्टीरियल संक्रमण, मधुमेह, हाई ब्लड प्रेशर, तनाव और ऑटोइम्यून डिसआर्डर आदि से ग्रस्त महिला को भी समय से पहले प्रसव हो सकता है।
लक्षण
शिशु के समय से पहले जन्म लेने के लक्षण
डॉ जसप्रीत ने कहा, "गर्भवती महिला के पेट में अधिक दर्द होना, पेल्विक वाली जगह पर अत्यधिक दबाव महसूस करना (जैसे शिशु नीचे की ओर आ रहा हो), योनि से अधिक स्राव होना या फिर खून निकलना प्रीमैच्योर शिशु के जन्म लेने के मुख्य लक्षण हैं।"
अगर किसी गर्भवती महिला को समय से पहले ये लक्षण दिखें तो वह समझ जाए कि शिशु कभी भी जन्म ले सकता है। ऐसी स्थिति में तुरंत अपने किसी करीबी के साथ अस्पताल जाएं।
डिलीवरी
प्रीमैच्योर शिशु के समय नार्मल डिलीवरी या ऑपरेशन, क्या सही विकल्प है?
इस बारे में डॉ जसप्रीत का कहना है कि प्रीमैच्योर शिशु को जन्म देना कोई सामान्य बात नहीं है और शिशु की डिलीवरी नार्मल होनी चाहिए या फिर ऑपरेशन से, यह बात पूरी तरह से डॉक्टर पर निर्भर करती है।
इस मामले में पिता या फिर घर के किसी भी सदस्य की राय लेने की जरूरत नहीं है क्योंकि डॉक्टर मां की स्थिति को देखकर ही डिलीवरी का तरीका अपनाता है।
जानकारी
प्रीमैच्योर डिलीवरी को रोकने का इलाज
डॉ जसप्रीत ने कहा कि अगर किसी गर्भवती महिला की गायनेकोलॉजिस्ट को अच्छे से जांच के बाद ऐसा लगता है कि महिला की प्रीमैच्योर डिलीवरी हो सकती है तो वो महिला को टोकोलिसिस जैसे इंजेक्शन लेने की सलाह देते हैं।
NICU
समय से पहले जन्मे बच्चे को NICU में क्यों रखा जाता है?
प्रीमैच्योर शिशु काफी नाजुक और कमजोर होते हैं, इसलिए उन्हें कुछ दिनों तक अस्पताल के NICU में रखा जाता है।
नियोनेटल इन्टेंसिव केयर यूनिट (NICU) नवजात शिशुओं का ICU होता है, जहां पर डॉक्टर और नर्सों की टीम प्रीमैच्योर शिशु की स्थिति को ध्यान में रखते हुए उसकी देखभाल करते हैं।
शिशु की स्थिति सामान्य नहीं है तो उसे अधिक दिनों तक NICU में रखा जा सकता है।
बीमारियां
प्रीमैच्योर शिशु को किन बीमारियों का अधिक खतरा रहता है?
डॉ जसप्रीत का कहना है कि प्रीमैच्योर शिशु को रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम (RDS) नामक फेफड़ों से जुड़ी बीमारी का खतरा रहता है।
इसके अलावा प्रीमैच्योर शिशु के दिमाग की रक्त वाहिकाएं छोटी और नाजुक होती हैं, जिसके कारण शिशु के दिमाग में खून बहने का जोखिम रहता है। इसे इंट्रावेंट्रिकुलर हेमरेज (IVH) कहा जाता है।
इसके साथ ही प्रीमैच्योर शिशु को पेटेंट डक्टस आर्टेरियोसिस (PDA), जॉन्डिस और एनीमिया आदि बीमारियों का भी खतरा रहता है।
शार्ट टर्म और लॉन्ग टर्म समस्याएं
प्रीमैच्योर शिशु को होने वाली शार्ट टर्म और लॉन्ग टर्म स्वास्थ्य समस्याएं क्या हैं?
डॉ जसप्रीत के मुताबिक, अगर कोई शिशु समय से पहले जन्मा है तो समझ जाइए कि उसके अंदरूनी अंग अभी अपरिपक्व (immature) हैं, जिन्हें परिपक्व होने में समय लगेगा और अगर इस दौरान कुछ दिक्कत आती है तो शिशु कोई कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि सटीक-सटीक यह नहीं बताया जा सकता है कि शिशु को शार्ट टर्म और लॉन्ग टर्म में क्या समस्याएं हो सकती हैं और ये अलग-अलग हो सकती हैं।
क्या आप जानते हैं?
क्या प्रीमैच्योर शिशु को शहद चखाना सही है?
डॉ जसप्रीत ने कहा कि हमारे देश में नवजात शिशु को शहद चखाने की परंपरा काफी पुरानी है, लेकिन ऐसा करना गलत है, फिर चाहें शिशु प्रीमैच्योर हो या फिर सामान्य। उनके पैदा होते ही उन्हें शहद चखाना गलत है।
देखभाल
घर आने के बाद प्रीमैच्योर शिशु की देखभाल कैसे करनी चाहिए?
इस बारे में डॉक्टर जसप्रीत ने कहा कि कि जब माता-पिता अपने प्रीमैच्योर शिशु को अस्पताल से घर ले आएं तो कुछ बातों का खास ध्यान रखें।
उदाहरण के लिए, कमरे का तापमान सामान्य होना चाहिए और शिशु को आरामदायक और ढीले कपड़े पहनाएं ताकि उसे सांस लेने में कोई दिक्कत न हो।
इसके अतिरिक्त शिशु को डॉक्टर की सलाह के अनुसार फीडिंग करानी चाहिए और फीडिंग के बाद डकार दिलाना न भूलें।
फीडिंग
फीडिंग के दौरान कंगारू केयर तकनीक को अपनाना बेहतरीन है- डॉ जसप्रीत
डॉ जसप्रीत ने कहा, "शिशु की फीडिंग के लिए मां को कंगारू केयर तकनीक अपनानी चाहिए।"
इसमें स्तनपान कराते समय मां को अपने शिशु को खुद से ठीक उसी तरह सटाकर रखना चाहिए जैसे कंगारू अपने बच्चे को खुद से चिपकाकर रखता है। इससे शिशु को काफी आराम मिलता है और वह खुद को अधिक सुरक्षित महसूस करता है।
हालांकि अगर मां शिशु को स्तनपान करवाने में असमर्थ हो तो वह उसे फार्मूला मिल्क दे सकती है।
समय
क्या प्रीमैच्योर शिशु को दूध पिलाने की अवधि छह महीने से अधिक होती है?
इस बारे में डॉ जसप्रीत का कहना है कि बात चाहें प्रीमैच्योर शिशु की हो या सामान्य जन्मे बच्चे की, उन्हें छह महीने तक मां को स्तनपान करवाना चाहिए। ऐसा कुछ नहीं है कि प्रीमैच्योर शिशु के लिए यह अवधि बढ़ जाती है।
मां चाहें तो अपने शिशु को एक से दो साल की उम्र तक भी स्तनपान करा सकती हैं, लेकिन इसके साथ शिशु को अन्य स्वास्थ्यवर्धक खाद्य और पेय पदार्थ जरूर दें।
वैक्सीन
प्रीमैच्योर शिशु को वैक्सीनें कब से लगवाना शुरू कर सकते हैं?
डॉ जसप्रीत ने कहा, "हम बाल चिकित्सक शिशु के वजन और जन्म की अवधि को ध्यान में रखते हुए माता-पिता को कहते हैं कि वे अपने शिशु को वैक्सीन लगवाना शुरू कर दें।"
उदाहरण के लिए, सामान्य शिशु 40 हफ्ते में होता है, लेकिन अगर कोई शिशु 28 हफ्ते में हो जाता है तो उसे तभी वैक्सीन लगवाई जानी चाहिए, जब वह 40 हफ्ते का हो जाए।
उन्होंने कहा कि शिशु को बच्चों वाली सारी वैक्सीनें लगवाना जरूरी है।
तनाव
प्रीमैच्योर शिशु के कारण हुए तनाव का माता-पिता को कैसे सामना करना चाहिए?
इस बारे में डॉ जसप्रीत का कहना है कि अगर माता-पिता के मन में अपने प्रीमैच्योर शिशु के स्वास्थ्य को लेकर कुछ बाते हैं तो उनके बारे में डॉक्टर को अच्छे से बताएं ताकि वह बातें तनाव का कारण न बन पाएं।
इसके अतिरिक्त उनसे बातें करें, जिनके प्रीमैच्योर शिशु बड़े हो रहे हैं।
इसके साथ ही माता-पिता अपने कुछ पसंदीदा काम करें या फिर मेडिटेशन करें ताकि वे तनाव से उभर सकें।
बचाव के उपाय
प्रीमैच्योर डिलीवरी से कैसे बचा जा सकता है?
डॉ जसप्रीत का कहना है कि गर्भावस्था से पहले और इसके दौरान महिलाएं अपने वजन को नियंत्रित रखें।
इसके अतिरिक्त संतुलित आहार लें, अपने रूटीन में डॉक्टर की सलाह के अनुसार कुछ एक्सरसाइज को शामिल करें और धूम्रपान और शराब जैसे नशीले पदार्थों से दूर रहें।
इसके साथ ही महिलाएं अपनी पहली गर्भावस्था और दूसरी गर्भावस्था के बीच कम से कम दो साल का अंतर रखें। इसके मानसिक रूप से भी स्वस्थ रहें।
जानकारी
डॉक्टर की सलाह अनुसार करें प्रीमैच्योर शिशु की देखभाल- डॉ जसप्रीत
डॉ जसप्रीत ने कहा कि प्रीमैच्योर शिशु की देखभाल से जुड़े ऐसे कई भ्रम और गलत धारणाएं हैं, जिन पर माता-पिता को आंख मूंदकर भरोसा नहीं करना चाहिए। बेहतर होगा कि माता-पिता अपने प्रीमैच्योर शिशु की देखभाल डॉक्टर की सलाह अनुसार ही करें।