
गिलगित-बाल्टिस्तान में फिर हो रहे प्रदर्शन, क्या है इसका इतिहास और भारत-पाकिस्तान के लिए महत्व?
क्या है खबर?
पाकिस्तान का गिलगित-बाल्टिस्तान फिर से सुर्खियों में है। यहां पिछले 12 दिनों से जमीन पर अवैध कब्जों, अनाज और खाद्य पदार्थों पर सब्सिडी, प्राकृति संसाधनों के दोहन और पाकिस्तानी सरकार के भेदभावपूर्ण रवैये के खिलाफ प्रदर्शन हो रहा है।
कुछ प्रदर्शनकारी इस क्षेत्र के लद्दाख में विलय की भी मांग कर रहे हैं। पिछले काफी समय से यह मांग उठ रही है।
आइये जानते हैं कि गिलगित-बाल्टिस्तान का इतिहास क्या है और भारत और पाकिस्तान के लिए क्यों महत्वपूर्ण है।
स्थिति
कहां है गिलगित-बाल्टिस्तान?
गिलगित-बाल्टिस्तान ग्रेटर कश्मीर का ही एक हिस्सा है और इसकी सीमा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख, अफगानिस्तान और चीन से लगती हैं। यहां करीब 15 लाख लोग रहते हैं।
भारत के नक्शे में जम्मू-कश्मीर का जो नक्शा दिखाया जाता है, उसमें गिलगित-बाल्टिस्तान भी आता है और यह PoK का 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा है।
हालांकि यह एक अलग प्रशासनिक इकाई है और इसकी अपनी अलग सरकार है। पाकिस्तान ने आजादी के समय ही इस पर कब्जा किया था।
इतिहास
क्या है गिलगित-बाल्टिस्तान का इतिहास?
आजादी से पहले गिलगित जम्मू-कश्मीर का हिस्सा था, लेकिन यहां अंग्रेजों का राज था। अंग्रेजों ने इसे राजा हरी सिंह से लीज पर लिया था।
26 अक्टूबर, 1947 को जब हरी सिंह ने भारत के साथ विलय पर हस्ताक्षर किए तो गिलगित स्काउट ने ब्रिटिश कमांडर मेजर विलियम एलेक्जेंडर ब्राउन के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया।
इन विद्रोहियों ने उस समय लद्दाख का हिस्सा रहे बाल्टिस्तान के साथ-साथ स्कार्दू, करगिल और द्रास पर भी कब्जा कर लिया था।
गिलगित-बाल्टिस्तान
1 नवंबर, 1947 को हुई आजादी की घोषणा
1 नवंबर, 1947 को रिवॉल्यूशनरी काउंसिल ऑफ गिलगित-बाल्टिस्तान नामक राजनीतिक दल ने गिलगित-बाल्टिस्तान के स्वतंत्र राज्य की और 15 नवंबर को पाकिस्तान में विलय की घोषणा की।
पाकिस्तान ने पूर्ण प्रशासनिक नियंत्रण की शर्त पर विलय स्वीकार किया और इस पर फ्रंटियर क्राइम्स रेगुलेशन के तहत शासन चलाने का फैसला लिया। फ्रंटियर क्राइम्स रेगुलेशन एक ऐसा कानून है, जिसे अंग्रेजों ने उत्तर-पश्चिम के आदिवासी इलाकों को नियंत्रण में रखने के लिए बनाया था।
जानकारी
1948 में भारत ने किया द्रास और करगिल पर नियंत्रण
1948 में हुई लड़ाई में भारतीय सुरक्षाबलों ने करगिल और द्रास को दोबारा अपने नियंत्रण में ले लिया था।
1 जनवरी, 1949 को भारत और पाकिस्तान के बीच हुए सीजफायर के बाद उस साल अप्रैल में पाकिस्तानी सरकार ने 'आजाद जम्मू-कश्मीर' की 'प्रोविजनल सरकार' के साथ समझौता कर पाकिस्तानी सेना द्वारा कब्जाए गए क्षेत्र की सुरक्षा और विदेश मामलों को अपने हाथ में ले लिया।
इस समझौते के तहत 'प्रोविजनल सरकार' ने गिलगित-बाल्टिस्तान का प्रशासन भी पाकिस्तान को सौंप दिया।
जानकारी
गिलगित-बाल्टिस्तान को नहीं मिला था प्रांत का दर्जा
1974 में आए पाकिस्तान के संविधान में पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और खैबर-पख्तूनख्वा को राज्य बताया गया। हालांकि, इसमें पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान को राज्य के तौर पर दर्जा नहीं दिया गया था।
इसकी एक वजह यह मानी गई थी कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंच पर चल रहे अपने केस को कमजोर नहीं करना चाहता था। दरअसल, पाकिस्तान चाहता था कि कश्मीर मुद्दे के समाधान के लिए जनमत संग्रह होना चाहिए।
बदलाव
2009 में हुआ बड़ा बदलाव
अमेरिका में 11 सितंबर, 2001 को हुए हमले के बाद स्थिति बदली और सामरिक विकास में चीन के बढ़ते दखल के बीच पाकिस्तान को इस क्षेत्र पर ध्यान देना पड़ा। इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि गिलगित-बाल्टिस्तान ही चीन और पाकिस्तान को जमीनी मार्ग से जोड़ता है।
2009 में पाकिस्तानी सरकार एक नया आदेश लेकर आई, जिसमें यहां नॉर्दन एरियाज लेजिसलेटिव काउंसिल (NALC) को बदलकर विधानसभा का प्रावधान किया गया और इस इलाके को फिर से अपना नाम मिला।
जानकारी
विधानसभा में सत्तारूढ़ पार्टी का बोलबाला
NALC में भी निर्वाचित सदस्य होते थे, लेकिन इसकी भूमिका पाकिस्तान सरकार में कश्मीर मामलों के मंत्री के सलाहकार से ज्यादा नहीं होती थी।
विधानसभा बनने के बाद हालात थोड़े बदले। इसके 24 सदस्यों का सीधा चुनाव होता है और नौ को मनोनित किया जाता है।
हालांकि, इसमें भी इस्लामाबाद में शासन चलाने वाली पार्टी हर बार चुनाव जीतती आई है। नवंबर, 2020 में इमरान खान की पार्टी ने यहां 33 में 24 सीटें अपने नाम की थी।
गिलगित-बाल्टिस्तान
2020 में पाकिस्तानी सरकार ने किया बड़ा ऐलान
1 नवंबर को गिलगित-बाल्टिस्तान में 'स्वतंत्रता दिवस' मनाया जाता है। 1 नवंबर, 2020 को तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने ऐलान किया कि उनकी सरकार गिलगित-बाल्टिस्तान को 'अस्थायी प्रांत का दर्जा' देगी। हालांकि, विपक्षी पार्टियों ने इसका विरोध किया था।
इस साल मार्च में यहां की नव-निर्वाचित विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर संविधान में संशोधन की मांग की है ताकि 'कश्मीर विवाद से प्रभावित हुए बगैर' गिलगित-बाल्टिस्तान को अस्थायी प्रांत का दर्जा दिया जा सके।
महत्व
पाकिस्तान के लिए क्यों जरूरी है गिलगित-बाल्टिस्तान?
गिलगित-बाल्टिस्तान का इलाका बेहद महत्वपूर्ण है और इसका एक अहम कारण भारत और पाकिस्तान के अलावा अफगानिस्तान और चीन से लगती इसकी सीमा है।
चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के कारण चीन के लिए इस इलाके का महत्व और बढ़ गया है। CPEC गिलगित-बाल्टिस्तान से होकर जाता है और पाकिस्तान के बलूचिस्तान स्थित ग्वादर पोर्ट को चीन के शिनजियांग प्रांत से जोड़ता है।
पाकिस्तान अपनी पानी की जरूरतों के लिए भी यहां के ग्लेशियरों पर निर्भर है।
महत्व
भारत के लिए क्यों जरूरी है यह इलाका?
भारत हमेशा से मानता रहा है कि आजादी से पहले के जम्मू-कश्मीर का पूरा हिस्सा उसका है। सरकार ने कई मौकों पर अपनी इस बात को दोहराया है।
जब पाकिस्तानी सरकार ने इसे एक प्रांत का दर्जा देने का ऐलान किया था, तब भारत ने इसका पुरजोर विरोध किया था।
पिछले साल अक्टूबर में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि उत्तर में भारत की विकास यात्रा गिलगित-बाल्टिस्तान के हिस्सों में पहुंचने के बाद ही पूरी होगी।