
दिल्ली: सरकारी अस्पतालों में 70 प्रतिशत बेड खाली, फिर मरीजों को क्यों नहीं मिल रही जगह?
क्या है खबर?
दिल्ली में कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों के बीच मरीजों को अस्पतालों में बेड न मिलने की खबरें लगातार आ रही हैं। अस्पतालों के वापस लौटाने और बेड न मिलने के कारण कई मरीजों की मौत भी हुई है।
बेडों की लेकर इस हाय-तौबा के बीच दिल्ली सरकार का कहना है कि उसके सरकारी अस्पतालों में लगभग 70 प्रतिशत बेड खाली हैं। अगर ऐसा है तो फिर मरीजों को बेड क्यों नहीं मिल रहे हैं?
बेडों की स्थिति
दिल्ली में बेडों की क्या है स्थिति?
'इंडियन एक्सप्रेस' के अनुसार, दिल्ली के अलग-अलग अस्पतालों में कोरोना वायरस मरीजों के लिए 9,179 बेड आरक्षित किए गए हैं। इनमें से 4,929 बेड भर चुके हैं और 4,250 बेड खाली हैं। इसके अलावा 582 ICU बेड को भी कोरोना वायरस के मरीजों के लिए आरक्षित किया गया है।
कुल बेडों में से 4,360 बेड दिल्ली सरकार के अस्पतालों और 1,470 बेड केंद्र सरकार के अस्पतालों में है। बाकी 3,349 बेड निजी अस्पतालों में हैं।
आंकड़े
दिल्ली सरकार के किस अस्पताल में कितने बेड?
दिल्ली सरकार के 4,360 आरक्षित बेडों में से 2,000 बेड लोकनायक जयप्रकाश नारायण (LNJP) अस्पताल, 1,500 बेड गुरु तेग बहादुर (GTB) अस्पताल, 500 बेड राजीव गांधी सुपर स्पेशिलिटी अस्पताल, 176 बेड दीप बंधु अस्पताल, 168 बेड राजा हरीश चंद्र अस्पताल और 16 बेड जग प्रवेश अस्पताल में हैं।
अगर खाली बेडों की बात करें दिल्ली सरकार के कोरोना ऐप के मुताबिक, बुधवार तक इनमें से 70 प्रतिशत से अधिक बेड खाली हैं।
खाली बेड
किस अस्पताल में कितने बेड खाली?
हर अस्पताल में खाली बेडों की बात करें तो LNJP अस्पताल में 61 प्रतिशत बेड खाली हैं। वहीं GTB अस्पताल में 89 प्रतिशत, राजा हरीश चंद्र अस्पताल में 87 प्रतिशत, दीप चंद बंधु अस्पताल में 53 प्रतिशत और राजीव गांधी अस्पताल में 49 प्रतिशत बेड खाली हैं।
जग प्रवेश अस्पताल में कोरोना वायरस मरीजों के लिए आरक्षित किए गए सभी बेड खाली हैं।
इन आंकड़ों से साफ है कि किसी-किसी अस्पताल में मरीज बिल्कुल भी नहीं पहुंच रहे हैं।
कारण
इसलिए सरकारी अस्पतालों के बेड हैं खाली
इन आंकड़ों पर गौर करने के बाद सवाल उठता है कि अगर दिल्ली सरकार के अस्पतालों में 70 प्रतिशत बेड खाली हैं तो फिर मरीजों को बेड क्यों नहीं मिल रहे।
विशेषज्ञों ने इसके पीछे सरकारी अस्पतालों में स्वच्छता, हाइजीन और सैनिटाइजेशन की कमी के कारण लोग निजी अस्पतालों में इलाज कराना ज्यादा पसंद करते हैं। सरकारी अस्पतालों में निजी अस्पतालों की तरह सिंगल रूम नहीं होते और मरीजों को एक-दूसरे के साथ वॉशरूम शेयर करना होता है।
जानकारी
एक वार्ड में मरीजों की अधिक संख्या भी चिंता का विषय
इसके अलावा सरकारी अस्पतालों में ज्यादातर मरीजों को जनरल वार्ड में भर्ती किया जाता है जिसमें एक हॉल में लगभग 10 मरीज होते हैं। सरकारी अस्पतालों में अटेंडेंट की कमी के कारण मरीज महसूस कर सकते हैं कि उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है।
कर्मचारियों की कमी
कर्मचारियों की कमी से भी जूझ रहे अस्पताल
दिल्ली सरकार के अस्पताल कर्मचारियों की कमी से भी जूझ रहे हैं और इसका भी उनकी सेवाओं पर असर पड़ रहा है।
राजीव गांधी अस्पताल के एक डॉक्टर के अनुसार, "हमारे पास 500 कोविड बेड हैं, लेकिन मौजूदा कर्मचारियों के साथ हम 100 प्रतिशत क्षमता पर कार्य नहीं कर सकते। हमारा अस्पताल कर्मचारियों की भारी कमी का सामना कर रहा है। मुद्दे को कई बार सरकार के सामने उठाया जा चुका है।"
जानकारी
AIIMS निदेशक बोले- सरकारी अस्पतालों को लोगों का भरोसा जीतने की जरूरत
AIIMS निदेशक रणदीप गुलेरिया के अनुसार, लोगों का भरोसा जीतने के लिए सरकारी अस्पतालों को अपना इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारना होगा। उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस के मरीजों को भर्ती कर रहे अस्पतालों को केंद्रीकृत ऑक्सीजन सप्लाई और उचित मात्रा में वेंटीलेटर्स की जरूरत है।
अन्य अस्पताल
केंद्र सरकार और निजी अस्पतालों का है कुछ ऐसा हाल
अगर अन्य अस्पतालों की बात करें तो केंद्र सरकार के अस्पतालों के 1,470 कोविड बेडों में से 84 प्रतिशत बुधवार तक भर चुके हैं। लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज में कोई खाली बेड नहीं बचा है, वहीं राम मनोहर लोहिया अस्पताल में दो, सफदरजंग अस्पताल में छह, AIIMS दिल्ली में 63 और AIIMS झज्जर में 164 बेड खाली बचे हैं।
इसी तरह निजी अस्पतालों के 3,349 कोविड बेडों में से केवल 29 प्रतिशत बेड खाली हैं।