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हरियाणा विधानसभा चुनाव 2024: सत्ता विरोधी लहर, किसान और पहलवान; कांग्रेस के क्यों नहीं आए काम?
हरियाणा में कांग्रेस को सत्ता विरोधी लहर के बावजूद हार का सामना करना पड़ा है

हरियाणा विधानसभा चुनाव 2024: सत्ता विरोधी लहर, किसान और पहलवान; कांग्रेस के क्यों नहीं आए काम?

लेखन आबिद खान
Oct 08, 2024
05:17 pm

क्या है खबर?

हरियाणा विधानसभा चुनाव 2024 के नतीजे आ चुके हैं। 10 साल से राज्य की सत्ता में काबिज भाजपा को जनता ने 5 साल के लिए और मौका दिया है। ये नतीजे कांग्रेस के लिए बड़ा झटका है, क्योंकि सत्ता विरोधी लहर, किसान आंदोलन और पहलवानों के मुद्दे पर जीत की पूरी आस लगाए बैठी पार्टी को कम से कम 5 साल और इंतजार करना होगा। आइए जानते हैं कांग्रेस की हार के संभावित कारण क्या रहे।

गुटबाजी

नेताओं की गुटबाजी पार्टी पर पड़ी भारी

कांग्रेस में शुरू से अंत तक गुटबाजी साफ नजर आई। पार्टी के 3 वरिष्ठ नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा, कुमारी सैलजा और रणदीप सुरजेवाला के समर्थकों में तालमेल की कमी थी। तीनों ही नेताओं के कार्यकर्ता अपने-अपने नेता को मुख्यमंत्री पद का दावेदार बताने लगे थे। हुड्डा और सैलजा के बीच की कड़वाहट तो कई बार सार्वजनिक मंचों पर भी नजर आई। दोनों मुख्यमंत्री बनने को लेकर स्पष्ट बयान दे रहे थे।

दलित मतदाता

कांग्रेस से दूर हुए दलित मतदाता

लोकसभा चुनाव में जाट और दलित वोटों कांग्रेस के साथ थे, लेकिन अब भाजपा में चले गए हैं। राज्य में जाटों का वोट करीब 22 प्रतिशत, जबकि दलितों का 20 प्रतिशत है। कांग्रेस का पूरा ध्यान जाट मतदाताओं पर था, उसने दलितों को नजरअंदाज किया। सैलजा को टिकट नहीं मिलने का भाजपा ने फायदा उठाया। भाजपा ने संदेश दिया कि कांग्रेस दलित नेताओं की कद्र नहीं करती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कांग्रेस पर दलितों को ठगने का आरोप लगाया।

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सहयोगी पार्टियां

सहयोगियों को नजरअंदाज करने का कितना असर हुआ?

हरियाणा में आम आदमी पार्टी (AAP) कांग्रेस से 10 सीटों की मांग कर रही थी, जबकि समाजवादी पार्टी (SP) भी 2 सीटें चाह रही थी। कांग्रेस इतनी सीटें देने के लिए राजी नहीं थी। खुद राहुल गांधी ने गठबंधन को लेकर एक समिति का गठन किया था, लेकिन सहमति नहीं बन पाई। कांग्रेस-AAP के बीच तो अंतिम समय तक चर्चा होती रही, लेकिन AAP ने नाराजगी में अपने उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी।

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अति आत्मविश्वास

अति आत्मविश्वास में रह गई कांग्रेस 

कांग्रेस को अंदाजा था कि 10 साल के बाद सत्ता विरोधी लहर, किसानों की नाराजगी, अग्निवीर का मुद्दा और पहलवानों के प्रदर्शन से भाजपा को बहुत नुकसान होगा, लेकिन नतीजे बता रहे हैं कि ऐसा नहीं हुआ। कांग्रेस जीत को लेकर अति आत्मविश्वास में रही और मुद्दे उठाने के बजाय उसके नेता सीधे मुख्यमंत्री बनने का सपना देखने लगे। लोकसभा चुनाव में 10 में से 5 सीटों पर जीत ने कांग्रेस को आत्मविश्वास को और बढ़ा दिया।

मुख्यमंत्री

काम कर गई भाजपा की मुख्यमंत्री बदलने की रणनीति?

इसी साल मार्च में भाजपा ने मनोहर लाल खट्टर को हटाकर नायब सिंह सैनी को मुख्यमंत्री बनाया। खट्टर पंजाबी हैं, जबकि सैनी अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) समुदाय से आते हैं। उन्हें मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने न सिर्फ OBC मतदाताओं को साधा, बल्कि सत्ता विरोधी लहर को भी कम किया। भाजपा ने ये चुनाव भी सैनी के चेहरे को आगे कर लड़ा। इससे भाजपा का जाट बनाम गैर-जाट एजेंडा भी आगे बढ़ा।

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