
#NewsBytesExplainer: कैसे नीतीश कुमार ने जातिगत सर्वे के जरिए एक तीर से 2 निशाने साधे?
क्या है खबर?
नीतीश कुमार को बिहार की सियासत का 'असली खिलाड़ी' कहा जाता है। पिछले 17 सालों से वो बिहार की सत्ता पर काबिज हैं।
अब जब बिहार में उनका राजनीतिक आधार खिसकने लगा तो उन्होंने जातिगत सर्वे करवाकर एक तीर से 2 निशाने साधे हैं। पहला, अपने वोटबैंक को साधने का काम किया है, दूसरा विपक्षी गठबंधन में अपनी अहमियत बढ़ा दी है।
आइए नीतीश के इस मास्टरस्ट्रोक के बारे में विस्तार से जानते हैं।
नीतीश
नीतीश की जाति की महज 3 प्रतिशत आबादी, फिर भी सत्ता पर काबिज
नीतीश स्वयं कुर्मी जाति से आते हैं, जिनकी बिहार में महज 3 प्रतिशत आबादी है। इसके बावजूद वो लंबे समय से मुख्यमंत्री हैं।
दरअसल, 2005 में सत्ता में आने के बाद उन्होंने अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC), गैर-यादव अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और महादलित वोटबैंक को अपने पक्ष में करने का काम किया।
जब 2010 में वो भाजपा के साथ थे, तब 55 प्रतिशत EBC का समर्थन मिला था और समय के साथ ये बढ़ता गया।
चुनाव
पिछले कुछ समय में खिसका नीतीश का वोटबैंक
पिछले कुछ वर्षों में नीतीश की पार्टी जनता दल यूनाइटेड (JDU) का वोटबैंक कमजोर हुआ है।
उदाहरण के तौर पर, 2020 बिहार विधानसभा चुनाव में JDU और भाजपा ने मिलकर चुनाव लड़ा था, जिसमें JDU महज 43 सीटें जीत पाई। इसके विपरीत 2015 चुनाव में उसने 71 सीटों पर जीत दर्ज की थी।
अब जातिगत सर्वे के जरिए नीतीश ने एक बार फिर से EBC, गैर-यादव OBC और महादलित जैसे पिछड़ों को अपने पीछे लामबंद करने का दांव खेला है।
नीतीश
जातिगत सर्वे से कैसे मजबूत हो सकता है नीतीश का वोटबैंक?
जातिगत सर्वे से सबसे ज्यादा फायदा EBC, OBC और महादलित जातियों को होने की संभावना है। अगर ऐसा हुआ तो इससे नीतीश को बड़ा लाभ हो सकता है। इन जातियों की राज्य की आबादी में 75 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी है और इसमें से कुछ वोटबैंक भी उनकी तरफ आया तो वो पहले की तरह मजबूत हो जाएंगे।
इसके अलावा नीतीश टिकट बंटवारे से लेकर पार्टी के संगठन तक में भी इन जातियों को मौका दे सकते हैं।
गठबंधन
राष्ट्रीय राजनीति के भी केंद्र में आए नीतीश
पिछले काफी समय से जातिगत जनगणना राष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है और सफल जातिगत सर्वे ने नीतीश को एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया है।
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, JDU के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, "राहुल गांधी आज देशभर में जाति जनगणना का मुद्दा उठा रहे, लेकिन नीतीश कुमार ने इसे 3 साल पहले उठाया, इस पर काम किया, कोर्ट में लड़ाई लड़ी और इसे पूरा किया।"
INDIA
विपक्षी गठबंधन की बैठक में सबसे पहली नीतीश ने उठाया था मुद्दा
ये सच है कि अभी भले ही राहुल जातिगत जनगणना का मुद्दा जोर-शोर से उठा रहे हों, लेकिन जून में विपक्षी गठबंधन INDIA की पहली बैठक में नीतीश ने ही ये मुद्दा सबसे पहले उठाया था और कहा था कि जातिगत जनगणना गठबंधन का मुख्य एजेंडा होना चाहिए।
तब तृणमूल कांग्रेस (TMS) इसके पक्ष में नहीं थी। हालांकि, शरद पवार के घर हुई समन्वय बैठक में इसे स्वीकार कर लिया गया।
INDIA
कैसे सर्वे से INDIA में बढ़ सकता है नीतीश का कद?
गौरतलब है कि नीतीश ही सबसे पहले विपक्षी पार्टियों को एक छतरी के नीचे लाए थे और इसी कारण वे INDIA गठबंधन की तरफ से प्रधानमंत्री पद के सबसे प्रमुख उम्मीदवारों में से एक हैं।
अब जातिगत सर्वे के जरिए उन्होंने विपक्ष को एक ऐसा मॉडल दिया है, जिसकी मदद से INDIA भाजपा को घेर हिंदुत्व और सोशल इंजीनियरिंग की राजनीति के उसके मिश्रित मॉडल को बेअसर कर सकता है।
जाहिर है कि इससे INDIA में नीतीश का कद बढ़ेगा।
जनगणना
न्यूजबाइट्स प्लस
जातिगत सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक, बिहार की कुल आबादी 13,07,25,310 है।
इनमें से अत्यन्त पिछड़ा वर्ग की आबादी 36.01 प्रतिशत, अति पिछड़ा वर्ग की आबादी 27.12 प्रतिशत, अनुसूचित जाति की आबादी 19.65 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति की आबादी 1.68 प्रतिशत और अनारक्षित यानी सवर्ण की आबादी 15.52 प्रतिशत हैं।
इसके अलावा राज्य की कुल आबादी में 81.9 प्रतिशत हिंदू धर्म, 17.7 प्रतिशत मुस्लिम धर्म, 0.05 प्रतिशत ईसाई धर्म, 0.08 प्रतिशत बौद्ध धर्म और 0.009 प्रतिशत जैन धर्म को मानते हैं।