
#NewsBytesExplainer: क्या है CrPC की धारा 125, तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं से जुड़ा 'सुप्रीम' फैसला कितना अहम?
क्या है खबर?
सुप्रीम कोर्ट ने 10 जुलाई को मुस्लिम महिलाओं से जुड़ा एक बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा कि तलाक होने पर मुस्लिम महिलाएं भी पति से भरण-पोषण पाने के लिए हकदार है।
न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि एक मुस्लिम महिला CrPC की धारा 125 के तहत अपने पति से भरण-पोषण मांगने की हकदार है।
आइए जानते हैं ये धारा 125 क्या है।
मामला
सबसे पहले जानिए क्या है मामला?
दरअसल, तेलंगाना के शख्स मोहम्मद अब्दुल समद की 2017 में अपनी पत्नी से तलाक हो गई थी। इसके बाद उनकी पत्नी ने ने फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर CrPC की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता देने की मांग की।
जून, 2023 में फैमिली कोर्ट ने समद को अपनी पत्नी को हर महीने 20,000 रुपये गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। समद ने इस फैसले को तेलंगाना हाई कोर्ट में चुनौती दी।
हाई कोर्ट
हाई कोर्ट ने कम कर दी गुजारा भत्ते की राशि
13 दिसंबर, 2023 को हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा, लेकिन गुजारे भत्ते की राशि को 20,000 से घटाकर 10,000 रुपये कर दिया।
इसके बाद समद ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। उसने दलील दी कि एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला धारा 125 के तहत याचिका दायर करने की हकदार नहीं है, क्योंकि मुस्लिम महिला पर 1986 का मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार का संरक्षण) कानून लागू होता है।
सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने कहा कि एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला भी धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता पाने के लिए याचिका दायर करने की हकदार है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 125 सभी शादीशुदा महिलाओं पर लागू होती है, जिनमें मुस्लिम महिलाएं भी शामिल हैं।
कोर्ट ने कहा कि अगर किसी मुस्लिम महिला की शादी या तलाक स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत होती है तो भी उस पर धारा 125 लागू होगी।
धारा 125
क्या है CrPC की धारा 125?
CrPC की धारा 125 में महिलाओं, बच्चों और माता-पिता को मिलने वाले गुजारा भत्ते का प्रावधान है।
इसके मुताबिक, कोई भी पुरुष अलग होने की स्थिति में पत्नी, बच्चे और माता-पिता को गुजारा भत्ता देने से इनकार नहीं कर सकता। अगर पत्नी, बच्चे और माता-पिता अपना खर्च नहीं उठा सकते तो पुरुष को उन्हें हर महीने गुजारा भत्ता देना होगा।
पत्नी को गुजारा भत्ता तब मिलेगा, जब वो खुद तलाक ले या पति तलाक दे।
प्रावधान
धारा 125 में और क्या हैं प्रावधान?
धारा 125 के मुताबिक, गुजारा भत्ता तब तक मिलेगा, जब तक महिला दोबारा शादी नहीं कर लेती।
इस धारा में ये भी प्रावधान है कि अगर कोई पत्नी बिना किसी कारण के पति से अलग रहती है या किसी और पुरुष के साथ रहती है या फिर आपसी सहमति से अलग होती है तो वो गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं होगी।
गुजारा भत्ता की राशि कितनी होगी, ये मजिस्ट्रेट तय करेंगे।
शाहबानो मामला
फैसले के बाद क्यों चर्चा में शाहबानो मामला?
23 अप्रैल, 1985 को सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो मामले में बड़ा फैसला दिया था। शाहबानो इंदौर की रहने वाली थीं और उनके पति ने उन्हें तीन तलाक दे दिया था।
तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि धारा 125 एक धर्म निरपेक्ष कानून है। अगर पत्नी (तलाकशुदा भी) अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है तो वो अपने पति से भरण-पोषण मांगने की हकदार होगी। कोर्ट ने कहा था कि सभी धर्मों की दंपत्तियों पर ये प्रावधान लागू होगा।
कानून
फैसले के बाद सरकार लाई थी नया कानून
शाहबानो मामले पर कोर्ट के फैसले का मुस्लिम धर्मगुरुओं और पर्सनल लॉ बोर्ड ने विरोध किया था।
इसके बाद 1986 में तत्कालीन राजीव गांधी सरकार मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार का संरक्षण) कानून लेकर आई और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया।
इसमें तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को भरण-पोषण के लिए एक विशेष सिस्टम प्रदान किया गया। इस कानून की धारा 3 में तलाकशुदा मुस्लिम महिला के गुजारा भत्ता का प्रावधान है।
कानून में प्रावधान
1986 के कानून में क्या हैं प्रावधान?
इस कानून की धारा 3 में लिखा है कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला को पूर्व पति से इद्दत की अवधि (90 दिन) तक ही गुजारा भत्ता मिल सकता है।
इसी धारा में ये भी लिखा है कि अगर तलाक से पहले या तलाक के बाद महिला अकेले बच्चे का पालन-पोषण नहीं कर सकती तो उसे 2 साल तक पति से गुजारा भत्ता मिलेगा। हालांकि, इस कानून को बाद में चुनौती दी गई थी।