
जलियांवाला बाग हत्याकांड के चश्मदीद गवाह सुधाकर चतुर्वेदी का 122 साल की उम्र में निधन
क्या है खबर?
स्वतंत्रता सेनानी सुधाकर चतुर्वेदी का बुधवार को देर रात कर्नाटक के जयनगर स्थित आवास पर निधन हो गया। 122 साल के चतुर्वेदी भारत के सबसे अधिक उम्र वाले लोगों में से एक थे।
वह लंबे समय से बीमार थे। रात को उन्हें सांस लेने में तकलीफ हुई और कुछ देर बाद उन्होंने अपने निवास पर ही अंतिम सांस ली।
चतुर्वेदी पंजाब के अमृतसर में 13 अप्रैल, 1919 को घटित हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड के चश्मदीद गवाह थे।
अंतिम संस्कार
पोती ने दी चुतुर्वेदी को मुखाग्नि
चतुर्वेदी के शिष्य सुधाकर शर्मा ने PTI को बताया कि बुधवार रात को उनका निधन होने के बाद प्रदेश के कई अधिकारी और गणमान्य नागरिक उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचे।
मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने भी उनके निधन पर शोक जताते हुए कहा कि चतुर्वेदी वेदों के ज्ञाता थे। गुरुवार को चामराजपेट श्मशान भूमि पर उनका अंतिम संस्कार किया गया।
उनकी पोती डॉ सुमा ने उन्हे मुखाग्नि दी। चतुर्वेदी के निधन से पूरे परिवार में शोक की लहर है।
जन्म
1897 में हुआ था चतुर्वेदी का जन्म
सुधाकर चतुर्वेदी का जन्म कर्नाटक राज्य के तुमकुर जिले में कायासंद्रा के बलेपेटे गांव में रामनवमी के दिन माधव परिवार में हुआ था।
गांव में प्रारम्भिक शिक्षा के बाद वह महज 11 साल की आयु में ही हिमाचल प्रदेश के कांगडा गुरुकुल में चारों वेदों का अध्ययन करने चले गए।
महज दो साल बाद ही उन्होंने आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती के शिष्य श्रद्धानंद को अपना गुरु बना लिया और 25 वर्ष की आयु तक वेदों अध्ययन किया।
जानकारी
वेदों के ज्ञान के लिए मिली थी चतुर्वेदी की उपाधि
स्वामी श्रद्धानंद के सानिध्य में चारों वेदों का अध्ययन करने और वेदों पर अपनी मजबूत पकड़ बनाने के कारण ही आर्य समाज ने सुधाकर माधव को चतुर्वेदी की उपाधि प्रदान की थी। उसके बाद से ही उन्हें सुधाकर चतुर्वेदी कहा जाने लगा था।
स्वतंत्रता सेनानी
महात्मा गांधी से मिलने के बाद स्वतंत्रता संग्राम में निभाई भूमिका
सुधाकर चतुर्वेदी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के समकालीन थे। उत्तर भारत के एक गुरुकुल में वेदों के अध्ययन के दौरान उनकी महात्मा गांधी से मुलाकात हुई थी।
पहली मुलाकात में ही वह गांधीजी के विचारों से प्रभावित हो गए थे और उनके साथा स्वतंत्रता संग्राम में भागिदारी निभाने का निर्णय कर लिया था।
इसके बाद वह गांधी के साथ विभिन्न आंदोलनों में शामिल हुए। इसके कारण उन्हें करीब 13 साल तक विभिन्न जेलों में सजा भी काटनी पड़ी थी।
जानकारी
गांधी के स्टेनोग्राफ बनकर की सेवा
सुधाकर चतुर्वेदी महात्मा गांधी के विचारों से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उनका अनुयायी बनने की ठान ली। यही कारण था कि उन्होेनें गांधीजी का स्टेनोग्राफर बनकर भी काम किया। बाद में उन्होंने कई बाद गांधी के विचारों से वायसराय को भी अवगत कराया था।
हत्याकांड
जलियांवाला बाग हत्याकांड के थे एकमात्र चश्मदीद गवाह
चतुर्वेदी अमृतसर में हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड के एकमात्र चश्मदीद गवाह भी रहे थे। उन्हीं के सामने ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर ने ब्रिटिश सेना को निहत्थे लोगों पर गोली चलाने का आदेश दिया था।
उनकी गवाही के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने 630 के मारे जाने की बात स्वीकार की थी।
गांधी ने चतुर्वेदी को मारे गए लोगों का सामूहिक अंतिम संस्कार करने का दायित्व सौंपा था।
इस पर चतुर्वेदी ने एक नदी के किनारे सभी का अंतिम संस्कार किया था।
भाषा ज्ञान
चार भाषाओं पर थी मजबूत पकड़
सुधारक चतुर्वेदी के चारों वेदों के ज्ञाता होने के साथ उनकी कन्नड, संस्कृत, अंग्रेजी और हिंदी भाषा पर अच्छी पकड़ थी। उन्होंने साहित्य का भी अच्छा ज्ञान था।
यही कारण था कि उन्होंने अपने जीवनकाल में 50 से अधिक पुस्तकें लिखी और उनमें से करीब 20 किताबों में उन्होंने वेदों का कन्नड़ भाषा में अनुवाद किया था।
उन्होंने कहा था कि यदि मनुष्य वेदों के सिद्धांतों का पालन करें तो वह 300 वर्ष तक भी जीवित रह सकता है।