
ऑस्ट्रेलिया-फेसबुक तकरार: खबरों की दुनिया में इतनी ताकतवर कैसे हुई फेसबुक?
क्या है खबर?
बीते गुरुवार को ऑस्ट्रेलिया में लोगों को फेसबुक में बड़ा बदलाव नजर आया। उनके फेसबुक फीड पर बाकी सारा कंटेट नजर आ रहा था, लेकिन खबरें गायब थीं।
इसकी वजह यह थी कि फेसबुक ने रातोंरात ऑस्ट्रेलियाई सरकार के प्रस्तावित कानून के विरोध में यूजर्स को अपने प्लेटफॉर्म पर न्यूज शेयर करने और देखने से ब्लॉक कर दिया था।
यह कानून लागू होने के बाद फेसबुक जैसी कंपनियों को कंटेट के बदले मीडिया कंपनियों को पैसा देना होगा।
जानकारी
खबरों की दुनिया में शिखर पर फेसबुक
शुुरुआत के कुछ ही सालों में फेसबुक ने खुद को खबरों की दुनिया में ऐसी जगह पर पहुंचा दिया है, जहां अधिकतर लोग उसके ही प्लेटफॉर्म से दुनियाभर की अपडेट लेते हैं। इसकी वजह से कई मीडिया कंपनियों को अपनी नीतियां भी बदलनी पड़ी हैं।
फेसबुक न्यूज फीड
ऑस्ट्रेलिया में खबरों का सबसे बड़ा स्त्रोत बनी फेसबुक
बाकी देशों की तरह ऑस्ट्रेलिया में भी फेसबुक लोगों के लिए खबरों का एक बहुत बड़ा स्त्रोत बन गई है।
रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2018-20 के बीच ऑस्ट्रेलिया के 40 प्रतिशत लोगों ने खबरों के लिए फेसबुक का इस्तेमाल किया।
किसी दूसरी कंपनी के प्लेटफॉर्म पर खबरों के लिए ऐसी निर्भरता नहीं देखी गई।
हालांकि, इस प्रभाव को लेकर कुछ चिंताएं भी सामने आईं। ये चिंताएं मीडिया के क्षेत्र में टेक कंपनियों के प्रभुत्व से जुड़ी हैं।
जांच
2018 में शुरू हुई थी जांच
BBC के अनुसार, 2018 में ऑस्ट्रेलिया की नियामक संस्था ने मीडिया और विज्ञापन क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा पर गूगल और फेसबुक के असर का पता लगाने के लिए जांच शुरू की थी।
ऑस्ट्रेलियाई कंपीटिशन एंड कंज्यूमर कमीशन की जांच में सामने आया कि मीडिया के क्षेत्र में राजस्व और मुनाफे का बड़ा हिस्सा इन टेक कंपनियों के पास जाता है।
ऑस्ट्रेलियाई मीडिया में डिजिटल एडवरटाइजमेंट पर खर्चे गए हर 100 रुपये में से 81 रुपये फेसबुक और गूगल को मिलते हैं।
ऑस्ट्रेलिया
असंतुलन को देखते हुए की गई कानून की सिफारिश
मुनाफे और राजस्व में इस असंतुलन को देखते हुए कमीशन ने एक आचार संहिता बनाने की आवश्यकता बताई ताकि हर किसी को आगे बढ़ने के समान मौके मिल सकें।
इसे लेकर बनाए जा रहे कानून के मसौदे के अनुसार, टेक कंपनियों को मीडिया से खबरें लेने के लिए पैसे देने होंगे। कानून लागू होने के बाद मीडिया कंपनियां टेक कंपनियों के साथ समझौता कर यह भी तय कर सकेंगी कि फेसबुक और गूगल पर उनका कंटेट कैसे दिखेगा।
मीडिया कोड
सरकार ने इस कानून के पीछे क्या तर्क दिया है?
अभी तक यह नहीं बताया गया है कि टेक कंपनियों को खबरों के लिए मीडिया घरानों को कितना भुगतान करना पड़ेगा, लेकिन सरकार का कहना है कि उन्हें इसके लिए 'उचित' रकम देनी होगी।
इसके पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि ऑस्ट्रेलिया में समाचार कंपनियां संघर्ष कर रही हैं और लोकहित और लोकतंत्र के लिए मीडिया का मजबूत होना जरूरी है।
हालांकि, फेसबुक ने इस कानून के साथ-साथ तर्क का विरोध किया है।
जानकारी
गूगल भी कानून के विरोध में, लेकिन कंपनियों से समझौत किया
गूगल ने भी इस प्रस्तावित कानून का विरोध किया है, लेकिन उसने देश के तीन बड़े मीडिया घरानों के लिए करोड़ों रुपये का समझौता कर लिया है। गूगल उनसे पैसे देकर खबरें लेंगी, जो यूजर्स को दिखाई जाएंगी।
बड़ा सवाल
क्या फेसबुक से मीडिया घरानों को फायदा नहीं होता?
फेसबुक का दावा है कि उसके प्लेटफॉर्म के कारण मीडिया घरानों को उससे ज्यादा फायदा होता है।
कंपनी के एक अधिकारी ने बताया कि पब्लिशर्स अपनी मर्जी से फेसबुक पर खबरें पोस्ट करते हैं। इसकी मदद से उन्हें ज्यादा दर्शक जुटाने में मदद मिलती है, जिससे उनका मुनाफा बढ़ता है।
हालांकि, इसका दूसरा पहलू भी है। एक रिपोर्ट में सामने आया था कि लोगों के लिए सोशल मीडिया पर आने की एक बड़ी वजह वहां खबरों का होना है।
जानकारी
पारदर्शिता को लेकर फेसबुक पर उठते हैं सवाल
दूसरी तरफ फेसबुक पर पारदर्शिता को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। कंपनी मीडिया घरानों को बिना पूर्व में जानकारी दिए अपने सॉफ्टवेयर और एल्गोरिदम में बदलाव करती रहती है। इसकी वजह से कई बार खबरें अपेक्षित यूजर्स तक नहीं पहुंच पाती।
चिंता
"अफवाह और असली खबरों का अंतर मिटा"
फेसबुक और मीडिया घरानों के बीच संबंधों के बारे में बताते हुए ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के रॉयटर्स इंस्टीट्यूट के निदेशक रेसमस नीलसन ने कहा कि फेसबुक के फीड फॉर्मेट के कारण अफवाहों और भरोसेमंद रिपोर्टिंग के बीच का अंतर समाप्त हो गया है।
हालांकि, वो इसके फायदे भी गिनाते हैं।
उनका कहना है कि अभी तक जो लोग खबरों से दूर रहते थे, वो अब बिना चाहे भी फेसबुक के कारण इनके संपर्क में आने लगे हैं।