
बिहार: युवक ने लकड़ी की सबसे छोटी चम्मच बनाकर बनाया रिकॉर्ड; जानिए इसका आकार
क्या है खबर?
चम्मच हर घर में अलग-अलग आकार और डिजाइन के मौजूद होते हैं, लेकिन क्या आपने कभी चावल के दाने से भी छोटी चम्मच देखी है?
यकीनन आपका जवाब न होगा, लेकिन बिहार के रहने वाले 25 वर्षीय शशिकांत प्रजापति ने एक ऐसी ही चम्मच बनाई है।
शशिकांत ने दुनिया की सबसे छोटी लकड़ी की चम्मच बनाकर अपना नाम गिनीज बुक में दर्ज किया है। इस चम्मच का आकार 1.6 मिमी (0.6 इंच) है।
आइये इसके बारे में जानते हैं।
रिकॉर्ड
शशिकांत ने पुराने रिकॉर्ड को तोड़कर बनाया नया रिकॉर्ड
गिनीज विश्व रिकॉर्ड के मुताबिक, शशिकांत एक मिनिएचर कलाकार हैं और उन्होंने लकड़ी की सबसे छोटी चम्मच बनाने का रिकॉर्ड बनाया है। इसका आकार 1.6 मिमी यानी 0.6 इंच है।
इससे पहले यह रिकॉर्ड साल 2022 में राजस्थान के जयपुर में रहने वाले नवरत्न प्रजापति ने बनाया था। नवरत्न ने 2 मिली (0.7 इंच) के आकार की लकड़ी की चम्मच बनाई थी।
सूक्ष्म कला बनाने वाला यह काम नवरत्न ने यूट्यूब पर वीडियोज देखकर सीखा था।
बयान
रिकॉर्डधारक शशिकांत ने क्या कहा?
शशिकांत ने गिनीज अधिकारियों से बताया कि लकड़ी से चम्मच बनाना काफी आसान है, लेकिन दुनिया की सबसे छोटी लकड़ी की चम्मच बनाना बहुत मुश्किल काम है।
उन्होंने आगे कहा, "2 मिमी से भी छोटी चम्मच बनाना बहुत मुश्किल था। मैंने इसके लिए बहुत कोशिश की और आज मैं इसमें सफल हो गया हूं। मुझे बहुत खुशी है। रिकॉर्ड हासिल करने से मुझे ऐसे और काम करने की ताकत मिलती है।"
जानकारी
किन चीजों का इस्तेमाल करके शशिकांत ने बनाई अनोखी चम्मच?
जानकारी के मुताबिक, शशिकांत ने एक शिल्प चाकू और एक सर्जिकल ब्लेड का इस्तेमाल करते हुए लकड़ी के एक टुकड़े से यह चम्मच बनाई है।
उन्होंने चम्मच बनाने की तकनीक को बेहतर बनाने के लिए कई अभ्यास किए।
इसके अलावा वह सूक्ष्म कला के प्रति जूनूनी हैं और विश्व रिकॉर्ड बनाकर अपनी कलात्मकता के लिए पहचान हासिल करना चाहते हैं।
इसके लिए वह पहले भी विश्व रिकॉर्ड बना चुके हैं।
सफर
आसान नहीं था सूक्ष्म कलाकार बनने का सफर
शशिकांत को पहली बार 2015 में कॉलेज के पहले साल में सूक्ष्म कला बनाने में रुचि हुई थी।
इसके बाद उन्होंने खुद को इस शौक के लिए पूरी तरह से समर्पित कर दिया। वह रोजाना 10-10 घंटे तक अभ्यास करते रहते थे, जो उनके लिए काफी मुश्किल था।
वह रात में नक्काशी का अभ्यास करते थे और दिन में कॉलेज जाते थे।
उस दौरान उनके पास माइक्रोस्कोप भी नहीं था, इसलिए इससे उनकी आंखों पर भी काफी दबाव पड़ता था।