
कर्नाटक-महाराष्ट्र सीमा विवाद: दोनों राज्यों की सरकारें आमने-सामने, जानिये पूरा मामला
क्या है खबर?
महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच सीमा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। दशकों पुराने इस मामले की जल्द ही सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है और उससे पहले दोनों राज्य सरकारों ने सीमाई क्षेत्र में पड़ने वाले गांवों पर अपना दावा जता दिया है।
वहीं कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई और उनके महाराष्ट्र समकक्ष एकनाथ शिंदे और उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस भी इस मामले को लेकर आमने-सामने आ गए हैं।
आइये इस बारे में विस्तार से जानते हैं।
शुरुआत
बोम्मई के बयान से हुई शुरुआत
बोम्मई ने इसी सप्ताह बयान दिया था कि सीमाई क्षेत्रों में पड़ने वाले गांवों ने प्रस्ताव पारित कर कर्नाटक में शामिल होने की इच्छा व्यक्त की थी।
उन्होंने कहा था कि जब ये गांव जल संकट से जूझ रहे थे, तब इन्होंने यह प्रस्ताव पारित किया था और कर्नाटक सरकार भी उनकी राज्य में विलय की मांग को गंभीरता से ले रही है। कर्नाटक सरकार ने उनकी मदद के लिए कुछ योजनाएं भी तैयार की हैं।
प्रतिक्रिया
फड़णवीस ने जताया विरोध
देवेंद्र फड़णवीस ने बोम्मई के इस बयान पर टिप्पणी देते हुए कहा कि इन गांवों ने 2012 में यह प्रस्ताव पारित किया था और हालिया समय में ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया है।
उन्होंने कहा कि उनकी सरकार के समय कर्नाटक के साथ इस मुद्दे को सुलझाने के लिए समझौता हुआ था। इसके अलावा इन गांवों में जलापूर्ति के लिए योजना भी बनाई गई थी। अब इस योजना पर काम शुरू किया जाएगा।
बयान
दोनों के बीच चले शब्दों के बाण
बीते दिन फड़णवीस ने कहा कि हालिया समय में महाराष्ट्र का कोई गांव कर्नाटक के साथ विलय नहीं करना चाहता। किसी भी गांव के कहीं भी जाने का कोई सवाल नहीं उठता।
इस पर पलटवार करते हुए कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने कहा कि फड़णवीस का बयान उकसावे वाला है और उनका सपना कभी पूरा नहीं होगा।
इसी बीच एकनाथ शिंदे ने भी कहा कि महाराष्ट्र की एक इंच जमीन भी कहीं नहीं जाएगी।
बयान
शिंदे बोले- नहीं जाने देंगे एक इंच भी जमीन
शिंदे ने कहा, "हम सीमाई इलाकों में मराठी लोगों को न्याय देने का काम कर रहे हैं। महाराष्ट्र की एक इंच जमीन को भी कहीं नहीं जाने दिया जाएगा। इन 40 गांवों की समस्या का समाधान करना हमारी सरकार की जिम्मेदारी है।"
बता दें कि इस विवाद को लेकर 23 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी थी, लेकिन यह फिलहाल टल गई है। महाराष्ट्र सरकार ने इस मामले पर निगरानी के लिए दो मंत्रियों को तैनात किया है।
सीमा विवाद
क्या है विवाद और कैसे हुई शुरुआत?
इस विवाद की शुरुआत उस समय हुई, जब भाषाई आधार पर राज्यों का गठन हुआ था।
दरअसल, मौजूदा समय में कर्नाटक में आने वाला बलगाम पहले बॉम्बे प्रेसीडेंसी में शामिल होता था। राज्यों के पुनर्गठन के समय बलगाम और इसके आसपास पड़ने वाले गांव मैसूर (अब कर्नाटक) में चले गए, जबकि इन इलाकों की अधिकतर आबादी मराठी-भाषी थी। यहीं से इस विवाद की शुरुआत हुई, जो आज तक सुलझा नहीं है।
सीमा विवाद
1967 में आई महाजन समिति की रिपोर्ट
महाराष्ट्र सरकार ने मराठी-भाषी क्षेत्रों के कर्नाटक में जाने पर केंद्र सरकार के सामने आपत्ति जताई।
करीब 10 साल तक चले हंगामे के बाद केंद्र सरकार ने 1966 में महाजन समिति का गठन किया, जिसमें दोनों राज्यों के प्रतिनिधि शामिल थे।
1967 में इस समिति ने अपनी सिफारिश में कहा कि 247 गांव और बलगाम कर्नाटक में रहेगा, जबकि 264 गांवों पर महाराष्ट्र का नियंत्रण होगा। 1971 में यह रिपोर्ट संसद में रखी गई।
जानकारी
महाराष्ट्र को मंजूर नहीं महाजन समिति की सिफारिशें
महाराष्ट्र ने महाजन समिति की रिपोर्ट को खारिज कर दिया, जबकि कर्नाटक ने इसे तुरंत लागू करने या यथास्थिति बनाए रखने की बात कही।
इसके बाद 2004 में महाराष्ट्र ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने दोनों राज्यों से अपने दावों को साबित करने के लिए दस्तावेज जमा कराने का आदेश दिया।
अब लंबे समय बाद इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होने की उम्मीद जगी है और विवाद फिर तूल पकड़ रहा है।