
#NewsBytesExplainer: बिना किसी ड्रामा के असल हालात दिखाने वाली डॉक्यूमेंट्री कैसे बनती हैं?
क्या है खबर?
ऑस्कर में इस साल भारत से निशा पाहुजा की डॉक्यूमेंट्री 'टू किल अ टाइगर' को बेस्ट डॉक्यूमेंट्री फीचर फिल्म की श्रेणी में नामांकन मिला था, लेकिन यह पुरस्कार पाने से चूक गई। हालांकि, इसने दुनियाभर के कई प्रतिष्ठित पुरस्कार समारोहों में खूब वाहवाही लूटी है।
डॉक्यूमेंट्री फिल्मों की अपनी एक अलग ही फैन फॉलाेइंग होती है। कुछ लोग तो इन्हें बड़े चाव से देखते हैं।
आइए आज हम आपको डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के बारे में विस्तार से बताते हैं।
परिभाषा
डॉक्यूमेंट्री है क्या?
डॉक्यूमेंट्री एक गैर-काल्पनिक सिनेमा है, जिसका मकसद वास्तविकता दर्शकों को दिखाना है। इसकी अवधि किसी भी फिक्शन फिल्म से अमूमन कम होती है और कुछ ही देर में यह अपनी कहानी से दर्शकों को ऐतिहासिक से लेकर समसामयिक मुद्दों को से परिचित कराती है।
यह अक्सर उन मुद्दों को बयां करती हैं, जिनके बारे में हमें ज्यादा जानकारी नहीं होती। डॉक्यूमेंट्री पूरी तरह से सच्चाई पर आधारित होती है। इसमें दिखाए जाने वाले लोग भी असली ही होते हैं।
महत्वपूर्ण बातें
डॉक्यूमेंट्री बनाते वक्त ध्यान में रखने वाली बातें
डॉक्यूमेंट्री बनाना आसान काम नहीं। इसे बनाने वाले यानी निर्माता को एक ऐसा मुद्दा चुनना पड़ता है, जिससे दर्शक तुरंत जुड़ सकें या कोई ऐसी कहानी हो, जिसका दर्शक लुत्फ उठा सकें।
विषय कुछ ऐसा होना चाहिए, जो भावुक कर देने वाला हो, या कुछ ऐसा, जो फिल्म पूरी होने के बाद भी दर्शकों के जहन में अपनी छाप छोड़ जाए।
इसके लिए निर्माता की शोध जितनी अच्छी होगी, वो फिल्म को उतनी ज्यादा वास्तविकता के करीब ले जा पाएगा।
नाम
'एक्चुएलिटी फिल्म' कहलाती थी डॉक्यूमेंट्री
पहले डॉक्यूमेंट्री कुछ ही मिनट लंबी होती थी और इसे एक्चुएलिटी फिल्म कहा जाता था।
हालांकि, पिछले कुछ समय में डॉक्यूमेंट्री निर्माण की कला में काफी बदलाव हुआ है। अब एक डॉक्यूमेंट्री की लंबाई में 1 घंटे से अधिक लंबी हो सकती है। कभी-कभार OTT पर रिलीज होने पर इनके कई एपिसोड भी बनते हैं।
19वीं शताब्दी में पहली बार डॉक्यूमेंट्री शब्द सुनने में आया था। इसका मकसद किसी विषय को लेकर लोगों के बीच जागरुकता बढ़ाना है।
#1 और #2
पोइटिक और एक्सपोजिट्री डॉक्यूमेंट्री
सबसे पहले बात करते हैं पोइटिक डॉक्यमेंट्री की, जिसमें दृश्यों पर ज्यादा जोर दिया जाता है। ये सच्चाई से कहीं ज्यादा दर्शकों को भावनाओं के जरिए जोड़ती हैं। 'रेन' और 'द टेस्ट ऑफ लाइफ' जैसी डॉक्यूमेंट्री पोइटिक डॉक्यूमेंट्री के ही उदाहरण हैं।
अब आते हैं एक्सपॉजिट्री डॉक्यूमेंट्री पर। आपने BBC पर 'प्लैनेट अर्थ' जैसे वाइल्ड लाइफ शो देखे होंगे, ये एक्सपॉजिट्री डॉक्यूमेंट्री की श्रेणी में ही आते हैं। इस डॉक्यूमेंट्री का मुख्य मकसद दर्शकों को जागरूक और शिक्षित करना है।
#3 और #4
ऑब्जर्वेशनल और पार्टिसिपेट्री डॉक्यूमेंट्री
डॉक्यूमेंट्री का तीसरा प्रकार है ऑब्जर्वेशनल। इसका उद्देश्य रोजमर्रा की जिंदगी को रिकॉर्ड करना है। इसे प्रत्यक्ष सिनेमा, या फ्लाई-ऑन-द-वॉल फिल्म निर्माण भी कहा जाता है। चर्चित डॉक्यूमेंट्री 'सेल्समैन' और 'हूल हूप' इसी के उदाहरण हैं।
उधर पार्टिसिपेट्री डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माण प्रक्रिया में लोगों को सीधे शामिल करती है। यहां फिल्म निर्माण की प्रक्रिया लोगों को एक मंच प्रदान करती है और उन्हें मुद्दे से जोड़ने के लिए एकसाथ लाती है। 'पेरिस इज बर्निंग' पार्टिसिपेट्री डॉक्यूमेंट्री ही है।
#5 और #6
रिफलेक्सिव और परफॉर्मेटिव डॉक्यूमेंट्री
रिफ्लेक्सिव डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माण का वो तरीका है, जो निर्माता और दर्शकों के बीच संबंधों पर केंद्रित है। यह दर्शकों को सीधे फिल्म निर्माण प्रक्रिया से अवगत कराती है। कैमरा पर्सन और नो लाइज इसी डॉक्यूमेंट्री के उदाहरण हैं।
उधर परफॉर्मेटिक डॉक्यूमेंट्री में निर्माता का अपना व्यक्तिगत अनुभव भी शामिल होता है। यह किसी भी विषय के साथ निर्माता के गहरे संबंधों पर आधारित होती है।
'वॉन्ट यू बी माय नेबर' और 'ड्रिफ्टर्स' परफॉर्मेटिक डॉक्यमेंट्री की श्रेणी में आती हैं।
लोकप्रिय डॉक्यूमेंट्री
भारत की सबसे चर्चित डॉक्यूमेंट्री
निष्ठा जैन की डॉक्यूमेंट्री 'गुलाबी गैंग' संपत पाल देवी और उनके निडर औरतों के गैंग की कहानी बताती है। यह जातिवाद और लिंग-भेद के खिलाफ भी लड़ती हैं।
'इंडिया अनटच्ड' एक ऐसी भारतीय डॉक्यूमेंट्री है, जिसे फिल्ममेकर स्टालिन के ने बनाया है। ये डॉक्यूमेंट्री भारत में जातिवाद और छुआछूत की समस्या को दिखाती है। इसके अलावा राइटिंग विद फायर, 'ऑल दैट ब्रीद्स', 'चिल्ड्रन ऑफ पायर', 'द स्टोरी ऑफ इंडिया और 'डांसिंग ऑन द ग्रेव्ज' भी देशभर में लोकप्रिय हैं।