
#NewsbytesExplainer: कैसे शुरू हुई थी यशराज फिल्म्स? ऐसा रहा अब तक का सफर
क्या है खबर?
यशराज फिल्म्स (YRF) के बिना भारतीय सिनेमा जगत की बात करना बेइमानी है। यह देश की सबसे बड़ी निर्माता कंपनियों में से एक है, जो हर साल कई लोकप्रिय फिल्मों का निर्माण करती है।
YRF ने हिंदी सिनेमा को सबसे खूबसूरत और यादगार फिल्में दी हैं, जिन्होंने नए निर्माताओं के लिए भी दरवाजे खोले। YRF की स्थापना 1970 में यश चोपड़ा ने की थी।
आइए फिल्म जगत में YRF के सफर के बारे में विस्तार से जानते हैं।
बीआर चोपड़ा
भाई बीआर चोपड़ा के साथ की शुरुआत
यश चोपड़ा मूल रूप से जलंधर के रहने वाले थे। वह 5 भाई-बहनों में सबसे छोटे थे।
यश के सबसे बड़े भाई बीआर चोपड़ा 50 के दशक में मुंबई आए और बीआर फिल्म्स के बैनर तले फिल्में और टीवी शो का निर्माण किया।
यश चोपड़ा की दिलचस्पी भी फिल्म निर्माण में थी और वह अपने भाई के साथ काम करने आ गए।
यश ने बीआर फिल्म्स में नौकरी शुरू कर दी।
पहली फिल्म
'धूल का फूल' से यश ने की निर्देशन की शुरुआत
यश ने फिल्म 'नया दौर' में सहायक निर्देशक के तौर पर काम किया। बीआर चोपड़ा को अपने भाई में प्रतिभा नजर आई और उन्हें अगली फिल्म का निर्देशन करने के लिए कहा।
1959 में यश ने निर्देशक के तौर पर डेब्यू किया और 'धूल का फूल' बनाई। इसके बाद उन्होंने बीआर फिल्म्स के लिए 5 फिल्मों का निर्देशन किया।
उन दिनों फिल्मों में विभाजन की त्रासदी का प्रभाव दिखता था। उनकी फिल्मों में संदेश और रोमांस दोनों होते थे।
यशराज फिल्म्स
1970 में यशराज फिल्म्स की स्थापना
1970 में यश की पामेला से शादी हुई। अपने हनीमून के दौरान उन्हें ख्याल आया कि अब उन्हें अपने भाई की छत्रछाया से निकलकर अपना कुछ शुरू करना चाहिए।
हालांकि, वह अपने भाई का साथ छोड़ने के लिए आश्वस्त नहीं थे। ऐसे में पमेला ने उनसे कहा कि अगर उनका दिल कहता है, तो उन्हें जरूर आगे बढ़ना चाहिए।
इसके बाद 1970 में उन्होंने यशराज फिल्म्स की स्थापना की।
यशराज फिल्म्स की पहली फिल्म
हिट हुई यशराज की पहली फिल्म 'दाग'
अब उन्हें निर्माता के तौर पर खुद को साबित करना था। उन दिनोंं के मशहूर डिस्ट्रीब्यूटर गुलशन राय की मदद से उन्होंने अपनी पहली फिल्म 'दाग' का निर्माण किया।
यह फिल्म 1971 में रिलीज हुई थी, जिसमें राजेश खन्ना, शर्मिला टैगोर और राखी ने मुख्य भूमिका निभाई थी।
नेटफ्लिक्स की डॉक्युमेंट्री 'द रोमांटिक्स' में पामेला चोपड़ा ने बताया था कि 'दाग' की रिलीज के पहले यश कई दिनों तक सोए नहीं थे। रिलीज होने के बाद यह फिल्म हिट हुई।
एक्शन फिल्में
'एंग्री यंग मैन' का दौर
70 का दशक देश में राजनीतिक रूप से तनावपूर्ण रहा। पूर्वी पाकिस्तान में अराजकता और इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल से लोग भारी तनाव में थे।
यह गुस्सा उन दिनों फिल्मों में भी दिखना शुरू हुआ और यशराज की फिल्मों में भी आम आदमी का गुस्सा और विद्रोह नजर आने लगा। ऐसे में अमिताभ बच्चन 'एंग्री यंग मैन' का चेहरा बनकर उभरे।
तब अमिताभ बच्चन हिंदी सिनेमा का पर्याय बन गए थे।
कभी कभी
बदलने लगे महिला किरदार
यश की फिल्मों में पामेला का भी प्रभाव रहा। यह पामेला के विचारों का असर था कि उनकी फिल्मों में महिला किरदारों में मजबूती दिखने लगी।
उनकी फिल्म 'कभी कभी' की स्क्रिप्ट पामेला ने ही तैयार की थी। फिल्म में राखी, वहीदा रहमान और नीतू सिंह मुख्य भूमिका में नजर आई थीं। उनके साथ अमिताभ, शशि कपूर और ऋषि कपूर ने मुख्य भूमिका निभाई थी।
'कभी कभी' और 'सिलसिला' जैसी फिल्में प्यार, रिश्ते और बेवफाई की जटिलता को दिखाती हैं।
चांदनी
मील का पत्थन साबित हुई 'चांदनी'
हर निर्माता-निर्देशक की तरह यश ने भी करियर का बुरा दौर देखा। उनकी फिल्में लगातार फ्लॉप हुईं और वह निराश हो गए।
उन्होंने फिल्म को सफल बनाने के गणित के साथ 'विजय' बनाई, लेकिन यह भी फ्लॉप हुई। इसके बाद उन्होंने फैसला किया कि अब वह बिना गणित के सिर्फ दिल से फिल्म बनाएंगे।
उन्होंने चांदनी पर काम शुरू किया। यह फिल्म उनकी आखिरी उम्मीद थी। 'चांदनी' न सिर्फ सफल हुई बल्कि उसने रोमांटिक फिल्मों के लिए दरवाजे खोल दिए।
आदित्य चोपड़ा
आदित्य चोपड़ा ने संभाली यशराज की कमान
2010 में यश के बड़े बेटे आदित्य चोपड़ा कंपनी के वाइस चेयरमैन बने।
2012 में आई शाहरुख खान की फिल्म 'जब तक है जान' यश के निर्देशन में बनी आखिरी फिल्म थी। अक्टूबर, 2012 में डेंगू से उनका निधन हो गया था।
यश के निधन के बाद आदित्य ने कंपनी के चेयरमैन का पद संभाला। यशराज बैनर के तले आदित्य कई महत्वाकांक्षी फिल्मों का निर्माण कर रहे हैं। इनमें से 'पठान-टाइगर-वॉर' की स्पाई यूनिवर्स सबसे चर्चित है।