
बेंगलुरू में 3D प्रिटिंग से बनाया जा रहा डाकघर, भारत में पहली बार हो रहा ऐसा
क्या है खबर?
3D प्रिटिंग से प्रिटिंग की दुनिया में कई बड़े बदलाव आए हैं, लेकिन क्या आपने सोचा था कि निर्माण कार्यों में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।
अगर नहीं तो आपको बता दें कि कर्नाटक के बेंगलुरू में उल्सूर बाजार नामक डाकघर का निर्माण 3D प्रिंटिंग का इस्तेमाल करके किया जा रहा है।
देश में पहली बार इस तरह का निर्माण हो रहा है, जिसके पूरा होने के बाद यह इमारत शहर में मील का पत्थर बन जाएगी।
परियोजना
परियोजना अगले 45 दिनों में हो जाएगी पूरी
यह निर्माण स्थल हलासुरु में स्थित है और 1,000 वर्ग फुट में फैला हुआ है। इसे लार्सन एंड टुब्रो (L&T) लिमिटेड द्वारा बनाया जा रहा है।
L&T लिमिटेड के अधिकारियों ने बताया है कि आने वाले 45 दिनों में डाकघर का निर्माण कार्य पूरा हो जाएगा।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, 3D प्रिंटिंग तकनीक तेज है और कार्य करने के लिए इसमें सीमित मात्रा में संसाधनों की जरूरत होती है। इस इमारत का मौजूदा स्वरूप नियमित इमारतों से काफी अलग है।
बयान
भविष्य में ऐसे और डाकघर बनने की उम्मीद
द हिंदू से बातचीत के दौरान कर्नाटक सर्किल के चीफ पोस्ट मास्टर जनरल एस राजेंद्र कुमार ने बताया, "हमारे पास 400 से अधिक जगहें हैं, जहां हम डाकघर बनाना चाहते हैं। इस डाकघर के निर्माण के बाद हम एक रिपोर्ट तैयार करेंगे और इसे विभाग में जमा करेंगे।"
उन्होंने कहा, "इसके बाद मौजूदा दिशानिर्देशों के आधार पर अगर विभाग रिपोर्ट को स्वीकार करेगा तो आगे ऐसे और डाकघर बनने की उम्मीद की जा सकती है।"
लागत
3D प्रिटिंग से डाकघर की लागत 30 से 40 प्रतिशत होगी कम
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, राजेंद्र कुमार ने बताया कि इस इमारत की लागत सामान्य डाकघर बनाने में आने वाली औसत लागत की तुलना में 30 से 40 प्रतिशत कम होगी।
इसका मतलब है कि 3D प्रिंटिंग तकनीक समय तो बचाती ही है, साथ ही पैसा भी बचाती है।
उन्होंने आगे कहा, "इमारत चौकोर या आयत आकार के अलावा किसी भी आकार की हो सकती है। यह इमारत लगभग 1 महीने में पूरी हो जाएगी।"
तकनीक
3D प्रिंटिंग कैसे काम करती है?
3D प्रिंटिंग तकनीक में मजदूरों से सभी चीजें कराने की बजाय कंप्यूटर-एडेड डिजाइन (CAD) से मदद ली जाती है।
इसका मतलब है कि इसके तहत निर्माण कार्य भौतिक न हो करके डिजिटल तरीके से होता है।
इसमें विभिन्न आकार, माप और रंगों में वस्तुओं को बनाने के लिए प्लास्टिक या कंपोजिट सामग्रियों का इस्तेमाल किया जाता है।
यह तकनीक स्कूल, बैरक, कारखाने, विला और डाकघर सहित कई संरचनाएं बना सकती है।