
नैतिक मूल्यों को बढ़ाने वाली प्रार्थनाएं किसी धर्म विशेष तक सीमित नहीं- सुप्रीम कोर्ट
क्या है खबर?
सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ में केंद्रीय विद्यालयों में सुबह की सभा के दौरान संस्कृत श्लोकों के पाठ की अनिवार्यता के मामले में बुधवार को सुनवाई हुई।
इसमें कोर्ट ने कहा कि नैतिक मूल्यों को विकसित करने वाली प्रार्थनाएं किसी भी धर्म विशेष तक सीमित नहीं हो सकती हैं। इस तरह की प्रर्थना छात्रों में नैतिक मूल्यों को मजबूत करती है। ऐसे में इन्हें किसी भी धर्म से जोड़कर नहीं देखना चाहिए।
मामले की अगली सुनवाई 8 अक्टूबर को होगी।
पृष्ठभूमि
क्या है केंद्रीय विद्यालयों में संस्कृत श्लोकों का मामला?
दरअसल, एक वकील ने 2017 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर केंद्र सरकार द्वारा साल 2012 में केंद्रीय विद्यालयों में संस्कृत श्लोक 'असतो म सदगमय!' का प्रार्थना में नियमित रूप से उच्चारण कराने के आदेश को चुनौती दी थी।
वकील ने कहा था कि केंद्रीय विद्यालयों में 1964 से संस्कृत और हिंदी में प्रार्थना हो रही है जो कि असंवैधानिक है। यह संविधान के अनुच्छेद 25 और 28 के खिलाफ है और इसे इजाजत नहीं दी जा सकती है।
नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगा था जवाब
मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी कर पूछा था कि क्या केंद्रीय विद्यालयों में सुबह की प्रार्थना हिंदुत्व को बढ़ावा देती है? यह बड़ा गंभीर संवैधानिक मुद्दा है, जिस पर विचार जरूरी है।
इस पर सरकार ने कहा था कि ये श्लोक सार्वभौमिक सत्य है और इन पर कोई आपत्ति नहीं कर सकता। जैसे कोर्ट में उपनिषद के यतो धर्मस्ततो जयः का प्रयोग होता है। इसका मतलब यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट धार्मिक हो गया है।
ट्रांसफर
सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक पीठ को ट्रांसफर किया था मामला
केंद्र के जवाब के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 28 जनवरी, 2019 को मामले को सुनवाई के लिए संवैधानिक पीठ के पास भेज दिया था। उस समय कोर्ट ने कहा था कि याचिका संविधान के अनुच्छेद 28 (1) के महत्व पर सवाल खड़ा कर रही है।
इस अनुच्छेद के अनुसार, कोई भी सरकारी निधि से चलने वाला विद्यालय धर्म विशेष की शिक्षा नहीं दे सकता है। ऐसे में यह संवैधानिक मामला बनता है और अब इसकी सुनवाई संवैधानिक पीठ ही करेगी।
सुनवाई
संवैधानिक पीठ ने नैतिक मूल्य बढ़ाने वाली प्रार्थना को बताया जरूरी
जस्टिस इंदिरा बनर्जी, सूर्यकांत और एमएम सुंदरेश की पीठ ने मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि इस तरह की प्रार्थना नैतिक मूल्यों को विकसित करने के लिए हैं। सामान्य शिक्षा में इसका अलग महत्व है। नैतिक मूल्यों को जन्म देने वाली प्रार्थना किसी धर्म विशेष से तक सीमित नहीं रह सकती है।
कोर्ट ने कहा कि स्कूल में जिस नैतिक मूल्यों की शिक्षा मिलती हैं और जो प्रार्थना करते हैं, वो जीवन भर बच्चों के साथ चलते हैं।
दलील
याचिकाकर्ता के वकील ने क्या दी दलील?
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील कॉलिन गोंजाल्विस ने कहा कि उनकी याचिका एक खास प्रार्थना को लेकर है और वह सबके लिए समान नहीं हो सकती है। सबकी उपासना की पद्धति अलग है, लेकिन उस स्कूल में सामूहिक प्रार्थना न बोलने पर सजा भी मिलती है।
उन्होंने कहा कि वह जन्मजात ईसाई हूं, लेकिन उनकी बेटी हिंदू धर्म का पालन करती है। मेरे घर में असतो मा सदगमय नियमित रूप से गूंजता है, लेकिन ये गहराई वाली बात है।
सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने 8 अक्टूबर तक के लिए टाली सुनवाई
वकील गोंजाल्विस ने कहा कि वह कोर्ट के सिद्धांत को महत्वपूर्ण मानते हैं, लेकिन यह एक विशेष समुदाय की याचिका है। अस्पसंख्यक समुदाय और नास्तिक परिजन इस प्रार्थना से सहमत नहीं हैं। इस मामले को लेकर अब केंद्रीय विद्यालय भी याचिका दायर कर रहा है।
इस पर कोर्ट ने कहा कि जस्टिस बनर्जी इसी महीने के आखिरी में सेवानिवृत्त हो रही हैं। ऐसे में मामले की सुनवाई को 8 अक्टूबर तक के लिए बढ़ाया जा रहा है।