
'चंदू चैंपियन' रिव्यू: 'चंदू' बनकर 'चैंपियन' बने कार्तिक आर्यन, कबीर खान का भी बेहतरीन प्रदर्शन
क्या है खबर?
पर्दे पर अपनी मस्तीभरी हरकतों से दर्शकों को हंसाने वाले कार्तिक आर्यन इस बार उनके कभी ना देखे गए अवतार में फिल्म 'चंदू चैंपियन' लेकर आए हैं।
देश के पहले पैरालंपिक स्वर्ण पदक विजेता मुरलीकांत पेटकर के जीवन पर आधारित इस फिल्म के निर्देशन की कमान कबीर खान ने संभाली है और निर्माण साजिद नाडियाडवाला ने किया है।
फिल्म कार्तिक के ट्रांसफॉर्मेशन और अपनी प्रेरणादायक कहानी के लिए सुर्खियों में थी।
चलिए जानते हैं कैसी है कार्तिक-कबीर की 'चंदू चैंपियन'।
कहानी
ओलंपिक चैंपियन बनने का ख्वाब देखने वाले बच्चे की कहानी
यह कहानी है महाराष्ट्र के छोटे से गांव में 1950 में जन्मे मुरलीकांत (कार्तिक) की, जिसके सपने बचपन से ही बड़े थे। वह होश संभालते ही पहलवान दारा सिंह की देखा-देखी कुश्ती के मैदान को अपनी कर्मभूमि बनाने का ख्वाब देखता है।
जब वह इसे पूरा करने मैदान में उतरता है तो लोगों के मजाक का पात्र बनता है।
हालांकि, वह कुश्ती के दांव-पेंच सीख अपनी चैंपियन बनने की आग को साबित कर सबका मुंह बंद कर देता है।
विस्तार
अपना सपना कैसे पूरा करेगा मुरलीकांत?
अखाड़े में डंका बजाने के बाद मुरलीकांत अपने सपनों की ट्रेन पकड़कर अपनी मंजिल के ओर करीब पहुंचता है। यहीं उसकी मुलाकात करनैल सिंह (भुवन अरोड़ा) से होती है, जिसकी सलाह मानकर वह फौज में भर्ती हो जाता है।
फौज में मुरलीकांत गुरू टाइगर अली (विजय राज) से मिलता है, जो उसको तराशते हैं। पहलवान बनने का सपना, फिर मुक्केबाजी में रजत पदक और ओलंपिक का सपना देखने की बड़ी कीमत। क्या..क्यों..कैसे? इनका जवाब आपको फिल्म देखने पर मिलेगा।
जानकारी
फिल्म देख याद आएगी 'भाग मिल्खा भाग'
फिल्म में फौज में भर्ती होने के बाद मुरली की ट्रेनिंग और कैंप में होने वाली गतिविधियां आपके मन में फरहान अख्तर की 'भाग मिल्खा भाग' की यादें ताजा कर देंगी। फौज को रास्ता बनाकर ही मिल्खा सिंह ने अपने सपनों को पूरा किया था।
अभिनय
कार्तिक ने जीता दिल
सपनों के लिए जुनूनी और कभी हार ना मानने वाले व्यक्ति के रूप में कार्तिक के अभिनय की जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है।
उन्होंने साबित किया कि अगर उन्हें कबीर जैसा तराशने वाला जोहरी मिले तो वह कोहिनूर हीरे की तरह चमक सकते हैं। यह कार्तिक के करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है।
उनके लाजवाब अभिनय ने ना केवल उनकी हल्के-फुल्के किरदार निभाने वाले अभिनेता की छवि तोड़ी, बल्कि साबित किया है कि वह वाकई बेमिसाल कलाकार हैं।
जानकारी
कबीर की बदौलत 'चंदू चैंपियन' बने कार्तिक
कार्तिक की बॉडी लैंग्वेज से लेकर उनकी डायलॉग डिलीवरी तक कुछ भी बनावटी नहीं लगा। कार्तिक को इस हद तक चमकाने और भोले-भाले 'प्यार का पंचनामा' वाले लड़के को 'चंदू चैंपियन' जैसा चुनौतीपूर्ण किरदार निभाने के लिए प्रेरित करने का श्रेय कबीर को जाता है।
सहायक कलाकार
विजय और भुवन भी चमके
फिल्म में अगर कार्तिक ने कोहिनूर सरीखा अभिनय किया है तो विजय भी सोने की तरह चमके हैं। मुक्केबाजी कोच के रूप में विजय ने कहानी में जान डालने का काम किया और हर फ्रेम में शानदार लगे।
भुवन ने भी शानदार अभिनय किया। वह कार्तिक के साथ एकमात्र ऐसे व्यक्ति के रूप में जुड़े रहे, जो सेना में प्रशिक्षण से लेकर मुक्केबाजी के दिनों तक उसका साथ देता है।
राजपाल यादव ने अपने किरदार के साथ न्याय किया है।
निर्देशन
निर्देशन में अव्वल रहे कबीर
कबीर ने आखिरी बार स्पोर्ट्स ड्रामा फिल्म '83' का निर्देशन किया था, जिसमें वह खेल की भावनाओं को पर्दे तक लाने में विफल रहे थे। हालांकि, इस फिल्म में चंदू के साथ ही वह भी चैंपियन रहे।
'83' से सबक लेकर उन्होंने इसके निर्देशन में कमाल दिखाया और दर्शकों को सीट से बांधे रखा।
कबीर के निर्देशन को लेखक सुमित अरोड़ा और सुदीप्तो सरकार का साथ मिला, जिन्होंने इस असल जिंदगी से प्रेरित कहानी को आखिर तक दिलचस्प बनाए रखा।
संगीत
कहानी के साथ तालमेल बिठाता संगीत
'चंदू चैंपियन' की सिनेमैटोग्राफी भी काबिल-ए-तारीफ है। आज से 50-60 साल पहले हमारा भारत देश कैसा रहा होगा, उसे पर्दे पर दिखाने में फिल्म की टीम कामयाब रही।
एक संवेदनशील और प्रेरणादायक फिल्म के लिए गानों का सही तरीके से इस्तेमाल करना मुश्किल हो सकता है, लेकिन कबीर और संगीतकारों ने इसे सही तरीके से किया है।
फिल्म के गाने इसमें दिखाई गई परिस्थितियों के हिसाब से बिल्कुल सही हैं और कहानी को पूरा करते हैं।
कमी
यहां हुई चूक
फिल्म में मुरलीकांत को ओलंपिक स्वर्ण पदक जीतने के सपने में डूबा हुआ दिखाया गया है, लेकिन कबीर उनके निजी जीवन के बारे में भी दिखा सकते थे।
उनके जीवन पर इतनी अच्छी रिसर्च करने के बाद भी निर्देशक मुरली की पत्नी और उनके बच्चों संग उनके पल फिल्म में डालने से चूक गए। यह फिल्म में अखरता है।
इसके साथ ही फिल्म की लंबाई भी आपको थोड़ा परेशान कर सकती है। यह फिल्म 2 घंटे 28 मिनट लंबी है।
निष्कर्ष
देखें या ना देखें?
क्यों देखें?- कार्तिक के फैन हैं तो 'चंदू चैंपियन' आपके लिए किसी ट्रीट से कम नहीं है क्योंकि इस फिल्म में आपको वह सर्वश्रेष्ठ रूप में नजर आएंगे। अपने जीवन में कुछ कर दिखाने की प्रेरणा तलाश रहे हैं तो यह फिल्म आपके लिए बनी है।
क्यों ना देखे?- अगर आपको किसी व्यक्ति की गौरव गाथा जानने में दिलचस्पी नहीं है तो आप आंख बंद करके इससे दूरी बना सकते हैं।
न्यूजबाइट्स स्टार्स- 3.5/5
जानकारी
इस साल रिलीज हुई अब तक की सर्वश्रेष्ठ बायोपिक
2024 में 'मैं अटल हूं', 'स्वतंत्र्य वीर सावरकर' और 'मैदान' जैसी बायोपिक फिल्में सिनेमाघरों में दस्तक दे चुकी हैं। निसंदेह 'चंदू चैंपियन' इनमें पहला स्थान हासिल करने में कामयाब रही है। ऐसे में इसे 2024 की अब तक की सर्वश्रेष्ठ बायोपिक कहना गलत नहीं होगा।