
2002 गुजरात दंगे: क्या है बिलकिस बानो गैंगरेप केस, जिसके 11 दोषियों को किया गया रिहा?
क्या है खबर?
गुजरात सरकार ने बिलकिस बानो गैंगरेप केस के सभी 11 दोषियों को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर रिहा कर दिया। सरकार ने 1992 की माफी नीति के तहत उन्हें गोधरा जेल से रिहा किया है।
2002 गुजरात दंगों के सबसे चर्चित मामलों में शामिल इस गैंगरेप केस के दोषियों को जेल से रिहा करने पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
आइए आपको एक बार ये पूरा मामला और इससे संबंधित केस के बारे में विस्तार से बताते हैं।
पृष्ठभूमि
क्या था बिलकिस बानो गैंगरेप केस?
गोधरा में कारसेवकों से भरी ट्रेन की बोगी में आग लगने के बाद हुए गुजरात दंगों के दौरान 3 मार्च, 2002 को दाहोद जिले के रंधिकपुर गांव में बिलकिस बानो के साथ गैंगरेप किया गया था।
उस वक्त बिलकिस 21 साल की थीं और पांच महीने की गर्भवती थीं। दंगाइयों ने बिलकिस के परिवार के सात सदस्यों की हत्या भी कर दी थी।
बाद में बिलकिस ने इस हैवानियत का पूरा घटनाक्रम बताया था।
वारदात
कैसे दिया गया वारदात को अंजाम?
राज्य में दंगे शुरू होने के बाद बिलकिस बानो अपने परिवार के 15 अन्य सदस्यों के साथ अपने गांव रंधिकपुर से भाग रही थीं। इनमें उनकी तीन साल की बच्ची भी शामिल थी।
हालांकि 3 मार्च, 2002 को 20-30 दंगाइयों ने पूरे परिवार को पकड़ लिया और उन पर तलवार, डंडों और चाकुओं से हमला कर दिया।
दंगाइयों ने बिलकिस समेत परिवार की अन्य महिलाओं के साथ गैंगरेप भी किया।
जानकारी
परिवार के मात्र तीन सदस्य जिंदा बचे, बाकी मारे गए या लापता
बाद में बिलकिस के सात परिजनों को घटनास्थल पर मृत पाया गया, वहीं छह लापता हो गए। 16 लोगों के परिवार में बस बिलकिस, उसकी तीन साल की बच्ची और एक पुरुष जिंदा बचे। होश आने के बाद बिलकिस ने ही FIR दर्ज कराई थी।
जांच
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर CBI ने की थी मामले की जांच
बिलकिस बानों के केस को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भी उठाया था और पुलिस जांच में खामियां मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंप दी थी।
CBI की जांच में सामने आया कि आरोपियों को बचाने के लिए मृतकों का पोस्टमार्टम लापरवाह तरीके से किया गया।
इसके अलावा सभी सात मृतकों के सिर भी गायब पाए गए। CBI के अनुसार, पोस्टमार्टम के बाद मृतकों के सिर को अलग किया गया।
सजा
छह साल सुनवाई के बाद 11 आरोपियों को हुई थी सजा
केस पर सुनवाई के दौरान बिलकिस बानो को जान से मारने की धमकियां भी मिली थीं, जिसके बाद केस को गुजरात से महाराष्ट्र ट्रांसफर कर दिया गया।
मुंबई की स्पेशल कोर्ट में हुई सुनवाई में छह पुलिसकर्मियों और एक सरकारी डॉक्टर समेत 19 लोगों के खिलाफ आरोप तय किए गए।
छह साल सुनवाई के बाद 21 जनवरी, 2008 को कोर्ट ने 11 आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई, वहीं बाकियों को सबूतों के अभाव में छोड़ना पड़ा।
रिहाई
दोषियों की हिराई कैसे हुई?
दोषियों ने अपनी सजा के खिलाफ बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी, हालांकि उन्हें यहां से राहत नहीं मिली और उनकी सजा बरकरार रही।
एक दोषी राधेश्याम ने माफी के लिए सुप्रीम कोर्ट का भी दरवाजा खटखटाया था, जिसने गुजरात सरकार को रिहाई के आवेदन पर फैसला लेने को कहा था।
गुजरात सरकार ने मामले में एक समिति का गठन किया था जिसने सर्वसम्मति से सभी 11 दोषियों को रिहा करने की सिफारिश की थी।
सरकार का पक्ष
गुजरात सरकार का क्या कहना है?
इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए गुजरात के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) राजकुमार ने बताया कि जेल में 14 साल पूरे होने और उम्र, जेल में बर्ताव और अपराध की प्रकृति जैसे कारकों के चलते सजा में छूट के आवेदन पर विचार किया गया था।
उन्होंने कहा कि उम्रकैद का मतलब न्यूनतम 14 साल की सजा होती है और इन दोषियों ने इतनी सजा काट ली है। सभी दोषी 15 साल से अधिक समय जेल में रहे हैं।
गुजरात दंगे
न्यूजबाइट्स प्लस
देश के सबसे भीषण दंगों में शामिल गुजरात दंगों की चिंगारी गोधरा में 27 फरवरी, 2002 को साबरमती ट्रेन के डिब्बों में आग लगने से भड़की थी। इस आग में अयोध्या से कारसेवा करके लौट रहे 59 हिंदू मारे गए थे।
घटना के बाद अहमदाबाद और उसके आसपास के इलाकों में मुस्लिम विरोधी हिंसा भड़क गई थी। ये दंगे दो-तीन दिन तक चले थे और इनमें 1,000 से अधिक लोग मारे गए थे। मरने वालों में अधिकांश मुस्लिम थे।