
सहमति से शारीरिक संबंध बनाने के लिए जन्मतिथि के सत्यापन की जरूरत नहीं- हाई कोर्ट
क्या है खबर?
दिल्ली हाई कोर्ट ने कथित तौर पर नाबालिग से रेप के मामले के एक आरोपी को यह कहते हुए जमानत दे दी कि सहमति से शारीरिक संबंध बनाने के लिए अपनी साथी की जन्मतिथि के न्यायिक सत्यापन की जरूरत नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि आधिकारिक दस्तावजों के अनुसार पीड़िता की तीन अलग-अलग जन्मतिथियां हैं। ऐसे में सहमति से शारिरिक संबंध बनाने के लिए आधार कार्ड या पैन कार्ड के जरिए उसकी जन्मतिथि के सत्यापन की आवश्यकता नहीं है।
प्रकरण
आरोपी के खिलाफ दर्ज कराया गया था नाबालिग से रेप का मामला
पीड़िता ने पिछले महीने पुलिस में एक शिकायत देते हुए कहा था कि आरोपी ने अप्रैल 2019 में उसे अपने साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए राजी किया था, लेकिन उस समय वह नाबालिग थी। एक बार संबंध बनाने के बाद आरोपी ने धमकाकर 2021 तक कई बार रेप किया था।
ऐसे में उसके खिलाफ यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियिम (POCSO एक्ट) में कार्रवाई होनी चाहिए। इस पर पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था।
याचिका
आरोपी ने दायर की थी जमानत याचिका
इस मामले में आरोपी ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर कर जमानत की मांग की थी।
याचिका में आरोपी के वकील अमित चड्ढा ने कहा कि युवती के आधार कार्ड में जन्मतिथि 1 जनवरी, 1998 है, लेकिन पैन कार्ड में 2004 है। इसी तरह पुलिस सत्यापन में जून 2005 मिली है। ऐसे में यह मामला संदिग्ध हनीट्रैप का नजर आ रहा है। इस मामले की नए सिरे से जांच के साथ आरोपी को जमानत दी जानी चाहिए।
सुनवाई
आधार कार्ड की जन्मतिथि के हिसाब से नहीं किया नाबालिग का रेप- हाई कोर्ट
24 अगस्त को सुनवाई करते हुए जस्टिस जसमीत सिंह ने कहा, "सच यह है कि एक आधार कार्ड है, जिसमें जन्मतिथि 1 जनवरी, 1998 है और यह इस बात को बताने के लिए काफी है कि आवेदक किसी नाबालिग से शारीरिक संबंध नहीं बना रहा था।"
उन्होंने कहा, "जहां तक जन्मतिथि का संबंध है, ऐसा लगता है कि पीड़िता की जन्म की तीन अलग-अलग तिथियां हैं। ऐसे में आधार कार्ड के हिसाब से उसे बालिग की श्रेणी में रखा जाएगा।"
टिप्पणी
"जन्मतिथि के सत्यापन की जरूरत नहीं"
जस्टिस सिंह ने कहा, "एक व्यक्ति जो साथ सहमति से शारीरिक संबंध बना रहा है, उसे अपनी साथी की जन्मतिथि के सत्यापन की जरूरत नहीं है। संबंध बनाने से पहले उसे उसका आधार कार्ड या पैन कार्ड देखने की अथवा उसके स्कूल के रिकॉर्ड से जन्मतिथि का सत्यापन करने की आवश्यकता नहीं है।"
उन्होंने कहा, "प्रथम दृष्टया यह हनी-ट्रैपिंग का मामला लगता है और FIR दर्ज करने में अत्यधिक देरी का भी कोई संतोषजनक कारण नहीं दिया गया है।"
आदेश
हाई कोर्ट ने दिए हनी-ट्रैप एंगल से मामले की जांच के आदेश
मामले में आरोपी के खाते से पीड़िता के खाते में 50 लाख रुपये ट्रांसफर किए जाने की बात सामने आने को लेकर कोर्ट ने पुलिस आयुक्त को मामले की हनी ट्रैप एंगल से भी जांच करने के निर्देश दिए हैं।
कोर्ट ने कहा कि पुलिस को यह भी पता लगाना चाहिए कि क्या पीड़िता ने इस तरह के अन्य मामले भी दर्ज करा रखे हैं। कोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामले में जो नजर आता है, उससे कहीं ज्यादा है।
जमानत
हाई कोर्ट ने आरोपी को दी सशर्त जमानत
कोर्ट ने मामले में आरोपी को 20,000 रुपये के एक स्थानीय मुचलके पर जमानत देने के आदेश देते हुए उसे उसे निर्दोष साबित होने तक समय-समय पर पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट करते रहने और मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट में उपस्थित होने के लिए पाबंद भी किया है।
इसके अलावा कोर्ट ने आरोपी को देश नहीं छोड़ने और अपना पासपोर्ट जमा कराने के साथ किसी भी आपराधिक गतिविधि में शामिल नहीं होने के लिए भी पाबंद किया है।