
रेपो रेट क्या होती है और इसके घटने-बढ़ने का आम आदमी पर क्या असर पड़ता है?
क्या है खबर?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बुधवार को रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी करने का ऐलान किया, जिसके बाद रेपो रेट 6.25 प्रतिशत से बढ़कर 6.50 प्रतिशत हो गई।
RBI के गर्वनर शक्तिकांत दास ने मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की बैठक के बाद रेपो रेट में वृद्धि की घोषणा की थी।
आइए जानते हैं कि मॉनेटरी पॉलिसी, रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट क्या होते हैं और इनका आम आदमी पर क्या असर पड़ता है।
पॉलिसी
सबसे पहले जानें क्या होती है मॉनेटरी पॉलिसी
RBI की मॉनेटरी पॉलिसी देश के आर्थिक विकास को सुरक्षित रखने और इसे बढ़ावा देने के लिए वित्तीय साधनों और उपायों का एक संग्रह है।
RBI विकास के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए मूल्य स्थिरता बनाए रखने के लिए समय-समय पर मॉनेटरी पॉलिसी की समीक्षा करता है।
मॉनेटरी पॉलिसी मूल रूप से वाणिज्यिक बैंकों और अप्रत्यक्ष रूप से आम लोगों और कंपनियों के लिए उपलब्ध धन की आपूर्ति को दर्शाती है।
दर
क्या होती है रेपो रेट?
RBI जिस दर पर बैंकों को कर्ज देता है, उसे रेपो रेट कहा जाता है। दरअसल, जिस प्रकार लोग अपनी जरूरतों के लिए बैंकों से पैसा लेकर ब्याज चुकाते हैं, उसी प्रकार बैंक जरूरत पड़ने पर RBI से लोन लेते हैं।
इस लोन पर बैंक जिस दर से RBI को ब्याज देते हैं, उसे रेपो रेट कहा जाता है। रेपो रेट अर्थव्यवस्था के सबसे अहम कारकों में से एक होती है।
रेट
रिवर्स रेपो रेट क्या होती है?
रिवर्स रेपो रेट वो ब्याज दर होती है जिस पर RBI देश के बैंकों से लोन लेता है। बाजार में नकदी की मात्रा बढ़ने के बाद RBI महंगाई दर बढ़ने से रोकने के लिए रिवर्स रेपो रेट बढ़ा देता है। इससे बैंक अपना ज्यादा पैसा RBI को देने लगते हैं, जिसके बदले केंद्रीय बैंक उन्हें ज्यादा ब्याज देता है।
RBI ने पिछले काफी समय से रिवर्स रेपो रेट में बदलाव नहीं किया है और यह फिलहाल 3.35 प्रतिशत है।
जानकारी
रेपो रेट से कम क्यों होती है रिवर्स रेपो रेट?
RBI के कमाने के लिए जरूरी है कि रेपो दर रिवर्स रेपो रेट से अधिक हो। RBI बैंकों की बचत पर ब्याज के भुगतान की तुलना में उन्हें दिए गए लोन पर अधिक ब्याज वसूलता है, जिससे उसकी कमाई होती है।
कारण
रेपो रेट कम होने से आम आदमी को क्या फायदा होता है?
अगर रेपो रेट कम होती है तो इसका मतलब हुआ कि बैंकों को RBI से कम ब्याज पर लोन मिलेगा।
बैंक इसका फायदा अपने ग्राहकों को भी देते हैं। रेपो रेट कम होने से आम लोगों को कम ब्याज दर पर घर और गाड़ी समेत दूसरी जरूरतों के लिए बैंक से लोन मिल पाता है।
रेपो रेट कम होने से विकास की गति बढ़ती है, लेकिन महंगाई बढ़ने की भी संभावना होती है।
बढ़त
रेपो रेट बढ़ने से आम आदमी की जेब पर पड़ता है बोझ
अगर रेपो रेट बढ़ाई जाती है तो बैंकों को लोन के लिए ज्यादा ब्याज चुकाना पड़ेगा और इसका असर आम लोगों की जेब पर भी पड़ता है क्योंकि अब लोगों को अधिक ब्याज अदा करना होगा। कई बार महंगाई को नियंत्रित करने के लिए रेपो बढ़ाई जाती है।
अगर रेपो रेट को बढ़ाया जाता है तो बैंक RBI से कम लोन लेते हैं और लोग भी लोन महंगा होने के कारण बाजार में पैसा लगाने से बचते हैं।
कारण
रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट में बदलाव होने से क्या होता है?
RBI रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट की दरों में बदलाव के जरिए बाजार को कुछ हद तक नियंत्रित करने की कोशिश करता है।
उदाहरण के लिए, यदि RBI रेपो रेट को कम करता है तो इससे आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहन मिलता है क्योंकि बैंक भी होम लोन समेत विभिन्न तरह के लोन सस्ते कर देते हैं, जिससे लोग अधिक लोन लेने और अधिक खर्च करने लगते हैं।
रेपो रेट बढ़ने पर अधिक ब्याज के कारण लोग लोग नहीं लेते।
संबंध
रेपो रेट का शेयर बाजार से क्या है संबंध?
शेयर बाजार और ब्याज दर का विपरीत संबंध है। RBI जब भी रेपो रेट बढ़ाता है तो इसका असर शेयर बाजारों पर देखने को मिलता है।
रेपो रेट में बढ़ोतरी के बाद कंपनियों को खर्च में कटौती करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। इससे विकास में गिरावट आती है और लाभ और भविष्य का नकदी प्रवाह प्रभावित होता है।
इसके चलते शेयरों की कीमतों में कमी शुरू हो जाती है और शेयर बाजार में गिरावट आती है।