कृष्ण जन्माष्टमी: भगवान कृष्ण को क्यों चढ़ाया जाता है छप्पन भोग? जानिए इसके पीछे का कारण
क्या है खबर?
भारत के कई मंदिरों में भगवान के साथ-साथ भक्तों को प्रसाद के रूप में देने के लिए भोजन और मिठाइयां बांटी जाती हैं। इसे भगवान के आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है।
देशभर में विभिन्न प्रकार के प्रसाद तैयार किए जाते हैं। उदहारण के लिए जगन्नाथ पुरी का महाप्रसाद, गणपतिपुले में मोदक, वैष्णो देवी में सूखे सेब आदि।
ऐसा ही एक विशेष प्रकार का प्रसाद है 'छप्पन भोग', जो कृष्ण जन्माष्टमी पर भगवान कृष्ण को जरूर अर्पित किया जाता है।
जानकारी
छप्पन भोग का क्या मतलब है?
यहां 'छप्पन' से मतलब संख्या 56 है, जबकि 'भोग' शब्द का अर्थ प्रसाद से है।
जहां इसमें माखन मिश्री, खीर, रबड़ी, जलेबी, मठरी, पूरी, टिक्की, काजू, खिचड़ीजरूर शामिल होते हैं, वहीं अधिकतर प्रसाद दूध, घी और सूखे मेवे आधारित होते हैं।
भगवान कृष्ण को समर्पित ये प्रसाद विशेष और शुभ अवसरों के दौरान तैयार किए जाते हैं।
जन्माष्टमी से लेकर गोर्वाधन तक और पुरूषोत्तम मास से लेकर कई अन्य त्योहारों पर भगवान कृष्ण को छप्पन भोग चढ़ाया जाता है।
कहानी
छप्पन भोग के पीछे की कहानी
जब भगवान कृष्ण ने भगवान इंद्र को प्रसन्न करने के लिए आयोजित समारोह को रोकने और गोवर्धन पर्वत की पूजा करने को कहा तो इससे इंद्र देव क्रोधित हो गए और उन्होंने ब्रज में भारी बारिश कर दी, जिससे ब्रज वासियों को बचाने के लिए कृष्ण ने गोर्वधन पर्वत को उठा लिया।
कृष्ण 7 दिन तक बिना कुछ खाए-पिए पर्वत को उठाए रखें, फिर 8वें दिन बारिश रूकने पर ब्रज वासियों ने कृष्ण के लिए छप्पन भोग बनाकर उन्हें खिलाया।
छप्पन भोग
छप्पन भोग में क्या-क्या शामिल होता है?
छप्पन भोग को 6 रस यानी कड़वा, तीखा, कसैला, खट्टा, नमकीन और मीठा के मेल से बनाया जाता है।
इसमें आमतौर पर चावल, सूप, चटनी, करी, कढ़ी, सीखरन, शरबत, बाल्का, इक्षु, बटक, मठरी, फेनी, पुरी, खजला, घेवर, मालपुआ, छोला, जलेबी, मेसू, रसगुल्ला, थूली, लौंगपुरी, खुरमा, दलिया, परिखा, लड्डू, साग, अचार, मोठ, खीर, दही, मक्खन, क्रीम, रबड़ी, पापड़, गाय का घी, सीरा, लस्सी, सुवत, मोहन, सुपारी, इलायची, फल, ताम्बूल, मोहन भोग, नमक, कषाय, शहद, तिक्त, कटु और आंवला शामिल होता है।
त्योहार
कब है कृष्ण जन्माष्टमी?
कृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष के 8वें दिन मनाई जाती है, जो इस साल 26 अगस्त को है।
अष्टमी तिथि की शुरूआत 26 अगस्त को सुबह 03:39 बजे होगी, जबकि इसकी समाप्ति का समय 27 अगस्त को सुबह 02:19 बजे है।
त्योहार की पूजा का समय 26 अगस्त को रात 12:00 बजे से लेकर 12:45 बजे तक रहेगा।
वहीं रोहिणी नक्षत्र 26 अगस्त को शाम 03:55 बजे से 27 अगस्त को शाम 03:38 बजे तक है।