भारत में धूम्रपान न करने वालों को ज्यादा हुआ है फेफड़ों का कैंसर
क्या है खबर?
फेफड़े का कैंसर दुनियाभर में मौत के प्रमुख कारणों में से एक है। धूम्रपान इस बीमारी का मुख्य कारण माना जाता है।
हालांकि, द लांसेट रीजनल हेल्थ साउथईस्ट एशिया जर्नल के शोध से पता चलता है कि इसके अन्य कारण भी हैं।
मुंबई में टाटा मेमोरियल सेंटर के डॉक्टरों की एक टीम द्वारा लिखे गए 'दक्षिणपूर्व एशिया में फेफड़ों के कैंसर की विशिष्टता' नामक लेख से पता चला कि फेफड़ों के कैंसर के अधिकांश मरीज धूम्रपान नहीं करते हैं।
अध्ययन
भारत में 2020 में सामने आए हैं फेफड़ों के कैंसर के 72,000 से अधिक मामले
इस अध्ययन के निष्कर्ष इस बात पर जोर देते हैं कि एशिया में फेफड़ों का कैंसर अन्य क्षेत्रों के मामलों से अलग है।
अध्ययन के अनुसार, एशिया में फेफड़ों के कैंसर के सबसे अधिक मामले चीन और जापान के बाद भारत में दर्ज किए गए हैं।
देश में 2020 में फेफड़ों के कैंसर के 72,510 खतरनाक मामले सामने आए थे और 66,279 लोगों ने इस बीमारी के कारण जान गवा दी थी।
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वायु प्रदूषण
अध्ययन में धूम्रपान न करने वालों में फेफड़ों के कैंसर के प्रमुख जोखिम कारकों में बढ़ते वायु प्रदूषण को रेखांकित किया गया है।
एस्बेस्टस, क्रोमियम, कैडमियम, आर्सेनिक, कोयला और सिगरेट के धुएं के लंबे समय तक संपर्क में रहने से फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।
वायु प्रदूषण ने देश में फेफड़ों के कैंसर के मामलों की वृद्धि में योगदान दिया है, जो 1990 में 6.62 प्रति 100,000 से बढ़कर 2019 में 7.7 प्रति 100,000 हो गई है।
#2
आनुवंशिकी कारक
अध्ययन में कहा गया है कि हार्मोनल स्थिति, पुरानी फेफड़ों की बीमारियां और आनुवंशिक संवेदनशीलता जैसे कारक भी धूम्रपान न करने वालों में फेफड़ों के कैंसर की बढ़ती घटनाओं में योगदान दे सकते हैं।
एपिडर्मल ग्रोथ फैक्टर रिसेप्टर (EGFR) जैसे जीन वाले लोगों में फैफड़ों का कैंसर धूम्रपान के कारण नहीं होता है।
इस तरह के मियूटेशन वाले लोगों में आनुवंशिक कारणों से अनियंत्रित कोशिका वृद्धि और ट्यूमर का विकास होने लगता है।
#3
जनसंख्या
फेफड़ों का कैंसर भारत में धूम्रपान न करने वालों को कई पश्चिमी देशों की तुलना में एक दशक पहले प्रभावित करता है, जिसमें निदान की औसत आयु 54 से 70 वर्ष के बीच होती है।
इसका एक योगदान कारक भारत की युवा आबादी है।
टाटा मेडिकल सेंटर के मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के लेखक डॉ. कुमार प्रभाष ने बताया, "अमेरिका में फेफड़ों के कैंसर की घटना दर प्रति 1,000 पर 30 है, लेकिन भारत में यह प्रति 1,000 पर 6 है।"
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ट्यूबरक्लोसिस का बढ़ा हुआ दर
डॉ. कुमार ने बताया कि भारत के फेफड़ों के कैंसर के मामलों की एक अन्य वजह ट्यूबरक्लोसिस का बढ़ा हुआ दर है।
उन्होंने कहा, "टीबी के कारण निदान में अक्सर देरी हो जाती है, क्योंकि दोनों स्थितियों में एक-दूसरे से समान लक्षण होते हैं।"
अध्ययन के लेखकों ने नए उपचार के तौर-तरीकों और अणुओं तक पहुंचने में कठिनाई का उल्लेख करते हुए कहा, "अधिकांश उपचार विदेशों में विकसित किए जाते हैं और उन्हें आयात करने से लागत बढ़ जाती है।"