
दिल्ली: इस हिंदू परिवार का धर्म है इंसानियत, 1984 में सिखों, इस बार मुस्लिमों को बचाया
क्या है खबर?
उत्तर-पूर्वी दिल्ली में दंगो के निशान कभी जाएंगे नहीं। कुछ असामाजिक तत्वों ने धर्म के नाम पर नफरत की आग लगाई तो कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने दूसरों को बचाने के लिए सिर्फ इंसानियत का धर्म देखा।
दंगे थमने के बाद अब कई ऐसी कहानियां सामने आ रही हैं जो इंसानियत में हमारे भरोसे को मजबूत करती हैं।
जो ये दिखाती है कि नफरत फैलाने की लाख कोशिशों के बावजूद जीत सिर्फ प्यार की होगी।
इंसानियत
सुनीता प्रेमी ने बचाई मुस्लिम परिवार की जान
ऐसी ही एक कहानी है उत्तर-पूर्वी दिल्ली के गोकलपुर गांव की रहने वालीं सुनीता प्रेमी की।
सुनीता का परिवार तीन पीढ़ियों से इस इलाके में रह रहा है। 1984 में हुए दंगों में उनके परिवार ने 30 से ज्यादा सिखों की जान बचाई थी।
इस बार के दंगों में उन्होंने अपनी सुरक्षा की परवाह किए बिना एक मुस्लिम परिवार के 12 लोगों की जान बचाई।
शायद इसीलिए कहा जाता है कि मारने वाले से बड़ा बचाने वाला होता है।
घटना
24 फरवरी की है घटना
यह 24 फरवरी की घटना है। दंगाइयों ने उस इलाके में स्थित टायर मार्केट को आग के हवाले कर दिया था।
इस मार्केट से थोड़ी दूर गुलनाज का घर है। जब उनके बच्चों ने उन्हें इस घटना के बारे में बताया तो उन्हें अपनी सुरक्षा की चिंता हुई।
गोकलपुर हिंदू बहुल इलाका है और यहां गुलनाज का परिवार एक मात्र मुस्लिम परिवार है। गुलनाज को डर था कि कहीं भीड़ उनके घर पर हमला न बोल दे।
घटना
फर्क नहीं पड़ता कि हम हिंदू हैं और वो मुस्लिम- सुनीता
सुनीता ने इंडिया टूडे को बताया, "मैं ये नहीं कहूंगी कि हमने उन्हें बचाया। वो मेरा परिवार है। हम पीढ़ियों से यहां रह रहे हैं। उनके बच्चे मुझे ताई बुलाते हैं और मेरे बच्चे उन्हें चाची बुलाते हैं। मैं उनसे प्यार करती हूं। इससे फर्क नहीं पड़ता कि हम हिंदू हैं और वो मुस्लिम। उनका परिवार डरा हुआ था। मैं उनकी गली में गई और उन्हें अपने घर लेकर आई। मैं आपको बता नहीं सकती हमने वो रात कैसे गुजारी।"
जानकारी
मैंने पूजा की, गुलनाज ने नमाज पढ़ी- सुनीता
सुनीता बताती हैं, "हम खुश हैं कि दंगा खत्म हो गया। यहां सब हिंदू हैं। यहां सरदार है, जाट हैं, पंजाबी हैं और बनिया भी हैं। हम सब उनको बचाना चाहते थे। उस रात गुलनाज ने नमाज पढ़ी और मैंने पूजा की।"
घर वापसी
छह दिन बाद अपने घर लौटा गुलनाज का परिवार
हिंसा थमने के बाद छह दिन बाद गुलनाज और उनका परिवार अपने घर लौट आया है। उन्होंने कहा, "मैंने कभी नहीं सोचा था ऐसा हो जाएगा। हम जीना चाहते हैं।"
सुनीता के परिवार के साथ लगाव के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा, "ईद पर हम सेवाइयां खाते हैं। दीवाली पर मिठाई खाते हैं। होली हम उनके साथ मनाते हैं। उन्होंने हमें कभी महसूस नहीं होने दिया कि हम मुस्लिम हैं और उनसे अलग हैं।"
1984
जब सुनीता के परिवार ने बचाई सिखों की जान
सुनीता के परिवार के 1984 में हुए कत्लेआम में सिखों की जान भी बचाई थी। सुनीता ने बताया, "मेरी सास बताती थी कि मेरे ससुर ने सिखों को बचाया था। वो हमारे घर में रुके थे। मेरी सास ने अपने हाथों से उनके बाल काटे थे ताकि उनकी जान बचाई जा सके। हम सब खुशी से रहे थे। इस बार भी मुझे ऐसा ही लगा। इस बार भी 1984 की तरह दंगा हुआ है।"
एकता
कायम है हिंदू-मुस्लिमों के बीच भाईचारा
गुलनाज के परिवार के मोहम्मद युनूस कहते हैं, "हम मेरठ से आए थे और यहां बस गए। जब तक सुनीता जी यहां है हम कहीं नहीं जा रहे। अगर वो और उनका परिवार कभी यहां से जाएगा तो हम भी चले जाएंगे। हम एक-दूसे के बिना नहीं रह पाएंगे।"
युनूस की यह बात सुनकर वहां खड़े उनके कई हिंदू पड़ोसी एक सुर में कहते हैं, "हम आपको कहीं नहीं जाने देंगे।"