
#NewsBytesExplainer: बॉलीवुड में कब शुरू हुआ प्लेबैक सिंगिंग का दौर, कौन-सा था पहला गाना?
क्या है खबर?
बॉलीवुड फिल्में गानों के बिना अधूरी लगती हैं। गाने न सिर्फ मनोरंजन करते हैं बल्कि कहानी को आगे बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाते हैं।
कई बार गानों की वजह से ही फिल्में ज्यादा लोकप्रिय हो जाती हैं, लेकिन क्या आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि फिल्मों में प्लेबैक सिंगिंग कैसे और कब शुरू हुई?
पहली बोलती फिल्म और सिनेमा को रंग कब मिले, ये आप जानते ही होंगे तो आइए प्लेबैक सिंगिंग के बारे में जानें।
शुरुआत
'धूप छांव' के लिए हुई थी पहली बार प्लेबैक सिंगिंग
बॉलीवुड के मशहूर निर्देशक नितिन बोस को सबसे पहले प्लेबैक सिंगिंग का विचार आया था।
इसके बाद उन्होंने अपनी 1935 में आई फिल्म 'धूप छांव' के लिए 'मैं खुश होना चाहूं' गाना बनवाया, जो पहला प्लेबैक गाना बन गया।
बोस ने इसकी जिम्मेदारी संगीतकार निर्देशक आरसी बोराल और पंकज मलिक को दी थी, जिन्होंने न्यू थिएटर्स नाम के प्रोडक्शन हाउस में गाने की रिकार्डिंग की थी।
इसे सुप्रवा सरकार, पारुल घोष और उमा शशि देवी ने अपनी आवाज दी थी।
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सितारे शूटिंग के दौरान खुद गाते थे गाने
इससे पहले सितारे डायलॉग की तरह शूटिंग के दौरान खुद ही गाने को गाते थे। इस दौरान संगीतकार भी सेट पर ही मौजूद रहते थे और वे अक्सर पेड़ या फिर अन्य प्रॉप्स के पीछे छिपकर संगीत देते थे।
हर सितारा अच्छा गाना नहीं गा नहीं सकता था और ऐसे में कई बार परेशानी होती थी, लेकिन केएल सहगल और नूरजहां जैसे महान गायकों की आवाज को काफी पसंद किया गया और उनकी लोकप्रियता बढ़ती चली गई।
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1947 के बाद इंडस्ट्री में हुआ बदलाव
1947 की शुरुआत में सहगल का निधन होने और गायिका नूरजहां के पाकिस्तान चले जाने के बाद इंडस्ट्री में खालीपन-सा आ गया।
फिर लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी जैसे महान गायकों ने इंडस्ट्री में आकर यहां छाए अंधकार को अपनी आवाज के जादू से दूर कर दिया।
ऐसे में प्लेबैक सिंगिंग की नींव 40 के दशक के अंत और 50 के दशक की शुरुआत में रखी गई थी, जिसे हिंदी फिल्म संगीत का स्वर्ण युग भी कहा जाता है।
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90 के दशक में बढ़ी प्लेबैक गानों की मांग
इसके बाद हुई 1990 और 2000 के दशक की शुरुआत, जिसमें अलका याग्निक, कुमार शानू और उदित नारायण जैसे गायकों की एक नई पीढ़ी ने इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनानी शुरू की।
उन्होंने स्वर्ण युग की विरासत को जारी रखा और फिल्मों में अपने हिट गाने दिए। उनके गाने शाहरुख खान, सलमान खान और आमिर खान जैसे अभिनेताओं की आवाज बन गए।
साथ ही लोगों की मिल रही अच्छी प्रतिक्रिया के चलते फिल्मों में गानों की मांग भी बढ़ने लगी।
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प्लेबैक सिंगिंग का पड़ता है गहरा प्रभाव
अब अरिजीत सिंह और श्रेया घोषाल जैसे गायकों ने बॉलीवुड के गानों को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया है।
उनके गाने न सिर्फ युवाओं के लिए एंथम बन गए हैं बल्कि बॉलीवुड के संगीत को एक अनूठी पहचान दिलाने में सफल रहे हैं।
ऐसे में भारतीय सिनेमा पर प्लेबैक सिंगिंग का बहुत गहरा प्रभाव है। स्वर कोकिला और रफी साहब से लेकर अरिजीत तक, सभी ने अपनी आवाज के जादू से फिल्मों को और यादगार बनाने में मदद की है।
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इन फिल्मों में थे सबसे ज्यादा गाने
साल 1932 में आई फिल्म 'इंद्रसभा' में 71 गाने थे, जिसमें 31 गजल, 9 ठुमरी, 4 होली के गाने, 2 चौपाई, 5 छंद और 15 गाने थे।
इसी तरह रणबीर कपूर और कैटरीना कैफ की 'जग्गा जासूस' में 29 गाने तो सलमान खान की 'हम आपके हैं कौन' और 'रॉकस्टार' में 14-14 गाने थे।
इसके अलावा सबसे लंबा 15 मिनट का गाना 'अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों' था, जिसे 3 अलग-अलग सीक्वेंस में फिल्म में दिखाया गया था।
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नहीं मिलती फीस! लाइव शो करके पैसा कमाते हैं गायक
आजकल हर फिल्म में गाने होते हैं, लेकिन इन्हें गाने के लिए कई गायकों को फीस नहीं मिलती।
राज शामनी के पॉडकास्ट में गायक अरमान मलिक ने बताया था कि ज्यादातर गायक फिल्मों में मुफ्त में गाना गाते हैं।
उनका कहना था कि निर्माताओं का मानना है कि गाना हिट होगा तो गायक लाइव शो करके पैसे कमा लेगा।
ऐसे में अरिजीत जैसे गायक साल में 40-50 शो करके प्रति शो से 1 करोड़ से ज्यादा की कमाई करते हैं।
जानकारी
ये हैं सबसे महंगे गायक
रिपोर्ट्स के अनुसार, बॉलीवुड में सबसे महंगे गायकों में पहले स्थान पर श्रेया हैं, जो एक गाने के लिए 20-25 लाख रुपये लेती हैं। इसके बाद अरिजीत 13 लाख, सोनू निगम 10 लाख, सुनिधि चौहान 9 लाख और नेहा कक्कड़ 8 लाख रुपये लेती हैं।