
स्पूतनिक वैक्सीन की 20 करोड़ खुराकें बनाएगी बेंगलुरू की स्टेलिस बायोफार्मा
क्या है खबर?
भारत के बेंगलुरू स्थिति स्टेलिस बायोफार्मा रूस की कोरोना वायरस वैक्सीन 'स्पूतनिक-V' की कम से कम 20 करोड़ खुराकें बनाएगी। कंपनी ने इस संबंध में रशियन डायरेक्ट इंवेस्टमेंट फंड (RDIF) से समझौता किया है।
भारत में RDIF की कॉर्डिनेशन पार्टनर एंन्सो हेल्थकेयर LLP के जरिए RDIF और स्टेलिस के बीच यह समझौता हुआ है। स्टेलिस 'स्ट्राइड्स फार्मा साइंस' का हिस्सा है।
समझौते के अनुसार, इस साल जुलाई से सितंबर की तिमाही में कंपनी इन खुराकों की सप्लाई शुरू कर देगी।
समझौते
स्पूतनिक के साथ समझौता करने वाली चौथी भारतीय कंपनी है स्टेलिस
स्पूतनिक वैक्सीन बनाने के लिए RDIF के साथ समझौता करने वाली स्टेलिस चौथी भारतीय कंपनी है और इसी के साथ इस वैक्सीन को बनाने की भारत की सालाना क्षमता 80 करोड़ खुराकें हो गई है।
इससे पहले इसी हफ्ते हैदराबाद की ग्लैंड फार्मा ने RDIF के साथ स्पूतनिक की 25.2 करोड़ खुराकें बनाने का सौदा किया था, वहीं पिछले साल हेटेरो बायोफार्मा ने स्पूतनिक की 10 करोड़ खुराकें बनाने का समझौत किया था।
मुख्य साझेदार
डॉ रेड्डीज लैबोरेट्रीज बनाएगी 25 करोड़ खुराकें, भारत में ट्रायल भी कर रही
इसके अलावा RDIF ने हैदराबाद की डॉ रेड्डीज लैबोरेट्रीज के साथ भी समझौता किया है जो न केवल स्पूतनिक की 25 करोड़ खुराकों का उत्पादन करेगी, बल्कि भारत में इसका तीसरे चरण का ट्रायल भी कर रही है।
कंपनी ने इस ट्रायल के अंतरिम नतीजों और अन्य देशों में हुए ट्रायल के नतीजों के आधार पर आपातकालीन उपयोग की मंजूरी भी मांगी है और इसे जल्द ही यह मंजूरी मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
तकनीक और ट्रायल
मानव एडिनोवायरस में बदलाव करके बनाई गई है स्पूतनिक वैक्सीन
स्पूतनिक-V वैक्सीन सामान्य जुकाम करने वाले मानव एडिनोवायरस में जेनेटिक बदलाव करके बनाई गई है। इसे रूसी सेना ने मॉस्को के गामालेया रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ एपिडिमियोलॉजी और माइक्रोबायोलॉजी के साथ मिलकर विकसित किया है।
कई देशों में हुए तीसरे चरण के ट्रायल में इस वैक्सीन को 91.6 प्रतिशत प्रभावी पाया गया था और यह कोरोना की सबसे अधिक प्रभावी वैक्सीनों में शुमार है।
इस ट्रायल के नतीजे प्रख्यात विज्ञान पत्रिका 'द लांसेट' में प्रकाशित भी हो चुके हैं।
फायदा
स्पूतनिक को दूरदराज इलाकों तक ले जाना होगा आसान
जानकारी के अनुसार, स्पूतनिक वैक्सीन को दो रूपों में बनाया गया है। पहला द्रव रूप है जिसे माइनस 18 डिग्री सेल्सियस पर रखना जरूरी होगा।
वहीं दूसरा लाइयोफिलाइज्ड (जमा हुआ) रूप है और इसे 2 से 8 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर रखा जा सकेगा। इससे इसे दूरदराज इलाकों में ले जाने में आसानी होगी।
दूरदराज के इलाकों में डिलीवरी की चुनौती को देखते हुए ही विशेष तौर पर लाइयोफिलाइज्ड रूप बनाया गया है।
विवाद
अगस्त में बिना ट्रायल पूरे किए ही लॉन्च कर दी गई थी स्पूतनिक
बता दें कि स्पूतनिक को अगस्त में बिना ट्रायल पूरे किए ही लॉन्च कर दिया गया था और इसे लेकर दुनियाभर के वैज्ञानिकों ने सवाल खड़े किए थे।
दरअसल, आमतौर पर किसी भी वैक्सीन को तीसरे चरण का ट्रायल पूरा होने के बाद ही लॉन्च किया जाता है जिसमें हजारों लोगों को इसकी खुराक देकर देखा जाता है कि ये कितनी प्रभावी और सुरक्षित है। वैक्सीन के सुरक्षित न होने पर ये लोगों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है।