
जब 3 भारतीय पायलट 1971 भारत-पाक युद्ध के बाद पाकिस्तानी जेल की दीवार तोड़कर भाग निकले
क्या है खबर?
भारत के वीर पायलट अभिनंदन वर्तमान पाकिस्तान की कैद से भारत वापस लौट चुके हैं।
उनकी वापसी के साथ ही पुराने उन तमाम भारतीय पायलटों और सैनिकों की कहानी सामने आ रही हैं जो पाकिस्तान की कैद में रहे।
एक ऐसा ही किस्सा हम आपको बताने जा रहे हैं जिसमें भारत के 3 पायलटों ने पाकिस्तान की सबसे सुरक्षित जेल की दीवार में छेद कर भागने की कोशिश की।
वह अपनी कोशिश में सफल रहे या नहीं, आइए जानते हैं।
1971 युद्ध
1971 में पाकिस्तान की कैद में रहे भारतीय पायलटों की कहानी
जिन 3 पायलटों की बात हम आपको बताने जा रहे हैं, वह दिलीप पारुलकर, मलविंदर सिंह गरेवाल और हरीश सिंह जी हैं।
यह तीनों ही 1971 युद्ध के समय भारतीय वायुसेना में फ्लाइट लेफ्टिनेंट के पद पर तैनात थे।
इस दौरान वह पाकिस्तान के कब्जे में आ गए।
जब भारत के नीति नियोजन समिति के अध्यक्ष डीपी धर पाकिस्तान आ कर वापस लौट गए और युद्धबंदियों के भाग्य पर कोई फैसला नहीं हुआ तो पारुलकर और गरेवाल बहुत निराश हुए।
योजना
दीवार में छेद करके भागने की योजना बनी
लड़ाई से पहले पारुलकर ने अपने साथियों से कहा था कि अगर वह पकड़े गए तो जेल में नहीं बैठेंगे और वहां से भागने की कोशिश करेंगे।
उनके कहे को हकीकत बनाने में उनके साथी बने गरेवाल और हरीश।
तीनों ने तय किया कि वह कोठरी संख्या 5 की दीवार में 21 बाई 15 इंच का छेद करके पाकिस्तानी वायुसेना के रोजगार दफ्तर के अहाते में निकलेंगे और फिर 6 फुट की दीवार फलांग कर माल रोड पर कदम रखेंगे।
तरीका
आसान नहीं था योजना को अमलीजामा पहनाना
इस योजना को अंजाम देना बेहद कठिन था और इसके लिए रावलपिंडी जेल की करीब 56 इंटों को उनका प्लास्टर निकाल कर ढीला करना था और इसके मलबे को कहीं छिपाना था।
प्लास्टर खुरचने का काम रात को 10 बजे के बाद किया जाता था। आखिर में तीनों अपने अन्य साथियों की मदद से दीवार में छेद करने में कामयाब रहे।
इस बीच उन्होंने एक पाकिस्तानी गार्ड, जो दर्जी का काम भी करता था, से पठानी सूट सिलवा लिए।
पाकिस्तान स्वतंत्रता दिवस
14 अगस्त को तय किया गया भागने का दिन
पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस 14 अगस्त को भागने का दिन तय किया गया क्योंकि इन दिन गार्ड छुट्टी के मूड में होंगे और कम सतर्क रहेंगे।
लेकिन 12 अगस्त की रात उन्हें बिजली कड़कने की आवाज़ सुनाई दी और उसी समय प्लास्टर की आखिरी परत भी गिर गई।
इसके बाद तीनों पायलट छेद से बाहर निकले।
इस दौरान आंधी और बारिश हो रही थी। इनके सहारे से वह किसी तरह से गार्ड को चकमा दे माल रोड पर पहुंच गए।
ईसाई नाम
तीनों ने रखे ईसाई नाम
थोड़ी दूर चलने के बाद हरीश को जब एहसास हुआ कि वो पाकिस्तान की सबसे सुरक्षित समझी जाने वाली जेल से बाहर आ गए हैं, तो वो जोर से चिल्लाए 'आज़ादी'।
इस पर गरेवाल ने कहा, "अभी नहीं।"
तीनों को नमाज नहीं आती थी, इसलिए खुद को ईसाई बताकर आगे जाने का फैसला किया और उसी हिसाब से नाम तय किए।
पाकिस्तानी वायु सेना में भी बहुत से ईसाई काम करते थे, इससे भी उन्हें मदद मिलने की उम्मीद थी।
अफगानिस्तान
अफगानिस्तान से बस 5 किलोमीटर दूर रह गए थे तीनों
बस स्टेशन पहुंच तक उन्होंने पेशावर की बस ली। वहां से उन्होंने जमरूद रोड जाने के लिए तांगा किया।
इसके बाद वह एक बस में बैठे। बस में जगह ना होने के कारण कंडक्टर ने उन्हें छत पर बैठा दिया। करीब साढ़े नौ बजे वह लंडी कोतल पहुंचे, जहां से अफगानिस्तान महज 5 किलोमीटर दूर था।
पारुलकर ने देखा कि सभी स्थानीय लोगों ने सिर पर कुछ ना कुछ पहना हुआ है तो उन्होंने भी दो पेशावरी टोपियां ले ली।
शक
तहसीलदार के अर्जीनवीस को हुआ शक
गरेवाल के सिर पर टोपी फिट नहीं आई तो पारुलकर इसे बदलने के लिए दोबारा दुकान पर गए।
इस दौरान एक लड़का जोर से चिल्लाने लगा कि टैक्सी से लंडीखाना जाने के लिए 25 रुपए लगेंगे।
तीनों टैक्सीवाले की तरफ बढ़ ही रहे थे कि पीछे से एक आवाज़ सुनाई दी। वह व्यक्ति तहसीलदार का अर्जीनवीस था।
उसने तीनों से पूछताछ करनी शुरु कर दी और उनकी एक ना सुनते हुए उन्हें तहसीलदार के पास ले गया।
किस्सा
तहसीलदार ने दिया जेल में डालने का आदेश
तहलीसदार भी उनकी बातों से संतुष्ट नहीं हुआ और उन्हें जेल में डालने का आदेश दिया।
अचानक पारुलकर ने कहा कि वो पाकिस्तानी वायुसेना के प्रमुख के एडीसी स्क्वाड्रन लीडर उस्मान से बात करना चाहते हैं।
ये वही उस्मान थे जो रावलपिंडी जेल के इंचार्ज थे और भारतीय युद्धबंदियों के लिए क्रिसमस का केक लाए थे।
पारुलकर से बात करने के बाद उस्मान ने तहसीलदार से कहा कि ये तीनों हमारे आदमी हैं और उन्हें अच्छे से रखे।
जुल्फिकार अली भुट्टो
भुट्टो ने किया छोड़ने का ऐलान
इन तीनों को वापस बाकी युद्धबंदियों के साथ लायलपुर जेल भेज दिया गया, जहां भारती थलसेना के युद्धबंदी भी थे।
एक दिन अचानक वहां पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो पहुंच गए और सभी युद्धबंदियों को छोड़ने का ऐलान किया।
एक दिसंबर, 1972 को सारे युद्धबंदियों ने वाघा सीमा से अपने वतन वापसी की और लोगों ने उनका जोरदार स्वागत किया।
अगले दिन राम लीला मैदान में उन सभी का सार्जनकि अभिनंदन किया गया।