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महाराष्ट्र की अद्भुत लोक कला है वारली चित्रकला, जानिए इसका इतिहास और अन्य जरूरी बातें

महाराष्ट्र की अद्भुत लोक कला है वारली चित्रकला, जानिए इसका इतिहास और अन्य जरूरी बातें

लेखन सयाली
May 13, 2025
06:08 pm

क्या है खबर?

वैसे तो भारत में कई लोक कलाएं प्रचिलित हैं, लेकीन वारली कला की बात ही निराली है। यह एक पारंपरिक लोक कला है, जो महाराष्ट्र में रहने वाली वारली जनजाति ने शुरू की थी। इसमें रोजमर्रा की जिंदगी, रीति-रिवाजों और प्रकृति को दर्शाया जाता है। इसमें सफेद रंग का इस्तेमाल किया जाता है और दीवारों पर आकर्षक कलाकृतियां उकेरी जाती हैं। आइए इस अद्भुत चित्रकला के विषय में विस्तार से जानते हैं और इसके समृद्ध इतिहास की चर्चा करते हैं।

इतिहास

कब शुरू हुई थी यह सुंदर चित्रकला?

वारली चित्रकला में आपको आदिमानवों द्वारा गुफाओं में बनाए गए चित्रों की झलक देखने को मिलेगी। इसीलिए ऐसा कहा जाता है कि यह 2500 से 3000 ई.पू. में शुरू हुई होगी। हालांकि, 1970 की शुरुआत में इसे पहचान मिली, जब कलाकार जिव्या सोमा माशे ने इसे दैनिक कला के रूप में अपनाया। इस कलाकार के योगदान से ही यह चित्रकला दुनियाभर में मशहूर हो सकी। शुरूआती दौर में इस कला के जरिए दीवारों को सजाया जाता था।

सार

वारली चित्रकला में बनाए जाते हैं ऐसे चित्र

सांस्कृतिक कार्यक्रमों और समारोहों में इस कला को प्रदर्शित किया जाता था। इसके जरिए इसे बनाने वाली जनजाति के दैनिक जीवन और परंपराओं को दर्शाया जाता था। वारली चित्रकला में कई जोमेट्रिक आकार बनाए जाते हैं, जिनमें गोल, त्रिकोण, वर्ग और रेखाएं शामिल होती हैं। ये आकार समुदाय के सदस्यों, प्रकृति और सामाजिक घटनाओं को प्रदर्शित करते हैं और जनजातीय जीवन की झलक पेश करते हैं। इन्हें खास तौर से शादियों के दौरान जरूर बनाया जाता है।

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तरीका

किस तरह बनाए जाते हैं वारली चित्र?

वारली चित्रकला एक बेहद सरल चित्रकला है, जिसमें केवल सफेद रंग के पेंट का इस्तेमाल किया जाता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि यह असल में पेंट नहीं, बल्कि पिसा हुआ चावल का पेस्ट होता है। इस कला के लिए पेंट ब्रश नहीं, बल्कि चबाई हुई बांस की लकड़ी इस्तेमाल होती है। इसे करने का पारंपरिक तरीका है मिट्टी से बने घर की दीवारों पर वारली चित्र बनाना। हालांकि, अब लोग इस कला को कागज पर भी उकेरने लगे हैं।

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आधुनिकीकरण

इस तरह हुआ वारली चित्रकला का नवीनीकरण

पारंपरिक वारली चित्रकला शुरुआत में केवल महाराष्ट्र तक सीमित हुआ करती थी। हालांकि, 1970 के दशक में जिव्या सोमा माशे और उनके बेटे बालू माशे ने इसकी लोकप्रियता को बढ़ाने के कई प्रयास किए। कोका-कोला इंडिया ने प्राचीन संस्कृति का जश्न मनाने और युवाओं के बीच एकजुटता की भावना को बढ़ाने के लिए वारली पेंटिंग को प्रदर्शित करते हुए 'दीपावली पर घर आएं' नामक एक अभियान शुरू किया था। इसके बाद इसकी प्रसिद्धि बढ़ गई थी।

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