
जानें कौन हैं देश के पहले लोकपाल पिनाकी चंद्र घोष, शांत स्वभाव के शानदार जज
क्या है खबर?
सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज पिनाकी चंद्र घोष देश के पहले लोकपाल बन सकते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन, प्रख्यात कानूनविद मुकुल रोहतगी की चयन समिति ने लोकपाल के लिए उनके नाम की सिफारिश की है और आज इसकी औपचारिक घोषणा हो सकती है।
नेता विपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने बैठक का बहिष्कार किया था।
आइए देश के पहले लोकपाल बनने जा रहे घोष के जीवन के बारे में आपको बताते हैं।
शुरुआती जीवन
वकील परिवार में हुआ था घोष का जन्म
जस्टिस घोष का जन्म 28 मई, 1952 को एक वकील परिवार में हुआ था।
उनके पिता स्वर्गीय शंभू चंद्र घोष कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे थे।
घोष ने कोलकाता के सेंट जेवियर्स कॉलेज से B.Com किया और इसके बाद कलकत्ता विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई की।
घोष ने 1976 में पश्चिम बंगाल बार काउंसिल में पंजीकरण के साथ अपने करियर की शुरुआत की। नागरिक, कंपनी, मध्यस्थता और संविधान से जुड़े मामलों में उन्हें विशेषज्ञता हासिल है।
कानूनी सफर
वकील से सुप्रीम कोर्ट के जज तक का सफर
घोष जुलाई 1997 में कलकत्ता हाई कोर्ट के जज बने और जून 2012 में उनका तबादला आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में हो गया।
इसी साल दिसंबर में वह इसी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बन गए।
मार्च 2013 में वह सुप्रीम कोर्ट के जज बने और यहीं से मई 2017 में वह रिटायर हुए।
अभी वह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य हैं।
इसके अलावा वह पश्चिम बंगाल राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के कार्यकारी चेयरमैन हैं।
महत्वपूर्ण फैसले
जयललिता को दोषी ठहराने वाली बेंच का हिस्सा थे घोष
सुप्रीम कोर्ट में अपने कार्यकाल के दौरान तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता और उसकी सहयोगी वीके शशिकला को लेकर सुनाया गया घोष का फैसला उनके सबसे बड़े फैसलों में से एक है।
वह फरवरी 2017 में जयललिता और शशिकला को आय से अधिक संपत्ति मामले में दोषी ठहराने वाली दो सदस्यीय बेंच का हिस्सा थे।
इसके अलावा वह घरेलू हिंसा के मामले में तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगाने वाले बेंच का भी हिस्सा थे।
स्वभाव
शांत और मित्रतापूर्ण स्वभाव के लिए जाने जाते हैं घोष
घोष के पुराने सहयोगी उन्हें शांत और मित्रतापूर्ण स्वभाव वाला व्यक्ति बताते हैं।
सुप्रीम कोर्ट वकील बिकाश रंजन भट्टाचार्य के अनुसार वह फैसला देने में बहुत तेज थे और उनकी याद्दाश्त बहुत अच्छी थी। वह एक शानदार जज थे।
बता दें कि 2011 में अन्ना हजारे के नेतृत्व में हुए लोकपाल आंदोलन के बाद तत्कालीन मनमोहन सरकार ने 2013 में लोकपाल कानून बनाया था, लेकिन तब से अब तक लोकपाल की नियुक्ति नहीं हो पाई थी।