हिडमा, बसवा राजू से लेकर देवजी तक, कैसे सिमटता जा रहा नक्सली नेतृत्व?
क्या है खबर?
वामपंथी उग्रवाद के खिलाफ लंबे समय से चल रहा संघर्ष अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। बीते दिन नक्सलियों के शीर्ष कमांडर देवजी के आत्मसमर्पण को नक्सली नेतृत्व के लिए आखिरी झटका माना जा रहा है। सरकार ने नक्सलवाद खत्म करने के लिए 31 मार्च, 2026 तक की समयसीमा तय की है। उससे पहले संगठन के बड़े नेता या तो मारे गए या हथियार डाल चुके हैं। आइए समझते हैं कि कैसे नक्सलियों के शीर्ष नेतृत्व का पतन हुआ।
देवजी
शीर्ष कमांडर देवजी ने डाले हथियार
बीते दिन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI माओवादी) के महासचिव टिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवजी ने अपने साथी संग्राम के साथ तेलंगाना में आत्मसमर्पण कर दिया। देवजी नक्सलियों की सेंट्रल मिलिट्री कमांड का प्रमुख रह चुका है और मई, 2025 में बसवा राजू की मौत के बाद शीर्ष पद संभाल रहा था। उस पर केवल छत्तीसगढ़ में ही एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित है। देवुजी और संग्राम दशकों से अबुझमाड और गढ़चिरोली में सक्रिय थे।
रणनीति
आत्मसमर्पण कराने के पीछे क्या है सुरक्षाबलों की रणनीति?
सुरक्षाबल लगातार नक्सलियों के रसद, भर्ती और लामबंदी का जिम्मा संभाल रहे नेतृत्व को निशाना बना रहे हैं, ताकि शीर्ष नेतृत्व और जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं के बीच एक खाई पैदा की जा सके। इसके चलते आपूर्ति श्रृंखला, हथियारों की आवाजाही और विद्रोहियों के लिए खुफिया जानकारी जुटाने में भी बाधा हुई है। देवजी के आत्मसमर्पण से ये भी पता चलता है कि जमीनी कार्यकर्ताओं के साथ अनुभवी शीर्ष नेतृत्व भी उग्रवाद से पीछे हट रहा है।
हिडमा
हिडमा की मौत नक्सलवादी नेतृत्व पर बड़ी चोट
नवंबर 2025 में सुरक्षाबलों ने कुख्यात नक्सली कमांडर माडवी हिडमा को मार गिराया था। हिडमा लंबे समय से बस्तर के जंगलों खासतौर पर छत्तीसगढ़-तेलंगाना सीमा पर सक्रिय था। वो CPI (माओवादी) की सशस्त्र शाखा का नेता था और गुरिल्ला आर्मी से जुड़ा हुआ था। उस पर एक करोड़ से ज्यादा का इनाम था। नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में हिडमा की मौत बड़ा कदम माना था। खुद गृह मंत्री अमित शाह ने इस अभियान के लिए सुरक्षाबलों की सराहना की थी।
बसवा राजू
बसवा राजू की मौत थी बड़ा झटका
मई, 2025 में बसवा राजू की मौत माओवादी नेतृत्व को लगे सबसे गंभीर झटकों में से एक थी। वो दक्षिण बस्तर डिवीजनल कमेटी का प्रमुख था और छत्तीसगढ़, ओडिशा से लेकर आंध्र प्रदेश की सीमाओं पर सक्रिय था। 2010 के दंतेवाड़ा हमले में CRPF के 75 जवान शहीद हुए थे। इस हमले में बसवा का ही हाथ था। बसवा की मौत से पहले से ही सिकुड़ रहा माओवादी नेतृत्व शीर्ष स्तर तक अस्थिर हो गया था।
दायरा
कैसे सिकडु़ता जा रहा नक्सलियों का दायरा?
माओवादियों का कभी फैला हुआ लाल आतंक वाला इलाका अब काफी सिकुड़ गया है। जिन जिलों को पहले नक्सलियों का गढ़ माना जाता था, वहां अब शासन व्यवस्था में तेजी आई है। बेहतर सड़क संपर्क, मोबाइल टावर और सुरक्षाबलों की मजबूत मौजूदगी ने नक्सली गुरिल्लाओं की आवाजाही को सीमित कर दिया है, जो उनकी युद्ध रणनीति की एक प्रमुख ताकत थी। सरकार की पुर्नवास योजना को भी इस दिशा में अहम माना जा रहा है।
लक्ष्य
मार्च, 2026 तक नक्सलवाद खत्म करने का है लक्ष्य
24 अगस्त, 2024 को गृह मंत्री अमित शाह ने मार्च, 2026 तक देश से नक्सलवाद खत्म करने की बात कही थी। उन्होंने कहा था, "लेफ्ट विंग माओवाद के खिलाफ लड़ाई अंतिम चरण में है। अब समय आ गया है कि वामपंथी उग्रवाद पर एक मजबूत रणनीति और निर्मम दृष्टिकोण के साथ अंतिम प्रहार किया जाए।" पिछले साल बजट सत्र के दौरान भी गृह मंत्री ने दोहराया था कि 31 मार्च, 2026 तक भारत नक्सलवाद मुक्त हो जाएगा।