
प्रोडक्ट्स की कीमतों के अंत में क्यों लिखा जाता है 99 या 999?
क्या है खबर?
किसी मॉल या शॉप में अक्सर आपने देखा होगा कि ज्यादातर प्रोडक्ट्स के प्राइस टैग पर 99,999 जैसा लिखा होता है।
कभी आपने सोचा है कि प्रोडक्ट की कीमत की आखिरी डिजिट 99 क्यों लिखी जाती हैं। कंपनी ऐसा क्यों करती है? वो चाहें तो 99 की जगह 100 रुपये भी तो लिख सकती हैं।
आइए आज जानने कि कोशिश करते हैं कि ज्यादातर प्राइस टैग पर कीमत को 9 के फॉर्मेट में क्यों लिखा जाता है।
वजह
प्रोडक्ट की कीमत को 99 पर रोकने का क्या है कारण?
किसी भी प्रोडक्ट की कीमत को एक रुपये कम करके लिखने का सीधा फायदा विक्रेता को मिलता है। इसके पीछे कई वजह होती हैं।
मार्केटिंग संबंधित प्रोफेसर ली ई हिब्बेट के मुताबिक, एक रुपये कम दिखाना कंपनियों का0 मनोवैज्ञानिक तरीका होता है, ताकि ग्राहक प्राइस को लेकर आकर्षित हो।
ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि जब हम किसी नंबर को पढ़ते है तो लेफ्ट से राईट की तरफ जाते हैं, ताकि उस नंबर की रेंज पता चल सके।
उदाहरण
उदाहरण से ऐसे समझें
मान लीजिए किसी प्रोडक्ट का मूल्य 24,000 रुपये है, लेकिन उस पर 23,999 रुपये लिखा है।
जैसे ही किसी भी शख्स की नजर प्राइट टैग पर जाएगी तो वह उसकी कीमत को वह 23,000 ही समझेगा। दरअसल, 99 वाले हिस्से पर ज्यादातर ग्राहकों की नजर नहीं जाती है।
मनोवैज्ञानिक तौर पर इंसान को 1,000 रुपये के मुकाबले 999 रुपए काफी कम लगते हैं, जबकि फर्क सिर्फ एक रुपये का ही होता है।
फायदा
एक रुपये कम करने से क्या होता है फायदा?
किसी भी प्रोडक्ट पर एक रुपये कम करने का सबसे ज्यादा फायदा कंपनी को होता है क्योंकि ज्यादातर लोग प्रोडक्ट लेने के बाद एक रुपये वापस नहीं लेते हैं। इसकी वजह से कंपनियों का बहुत फायदा होता है।
बड़े से बड़े वैज्ञानिकों का भी मानना है कि प्रोडक्ट की कीमतों में 99 लिखने से ग्राहकों का भी व्यवहार बदलता है।
इसलिए ज्यादातर कंपनियों अपने प्रोडक्ट की कीमत को एक रुपये कम करके ही दिखाती हैं।
उदाहरण
इस उदाहरण से समझें फायदा
मान लीजिए कि किसी कंपनी के 100 आउटलेट हैं और हर आउटलेट पर रोजाना 100 ग्राहक आते हैं। ऐसे में अगर ग्राहक अपना एक रुपये नहीं लेते हैं तो जानते हैं कंपनी को कितना फायदा होगा।
एक साल में 365 दिन होते हैं, इसके हिसाब से एक साल में 100*100*365= 36,50,000 रुपये की बचत होती है। यानि कंपनी के पास एक साल में ग्राहकों से 36 लाख रुपये अधिक आते हैं और इसका कोई हिसाब भी नहीं होता है।