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अल्बर्ट आइंस्टीन का युद्ध-विरोधी पत्र हो रहा नीलाम, परमाणु बम को बताया था सबसे बड़ी गलती
अल्बर्ट आइंस्टीन का पत्र हो रहा है नीलाम

अल्बर्ट आइंस्टीन का युद्ध-विरोधी पत्र हो रहा नीलाम, परमाणु बम को बताया था सबसे बड़ी गलती

लेखन सयाली
Jun 21, 2025
01:07 pm

क्या है खबर?

अल्बर्ट आइंस्टीन को 20वीं सदी के सबसे प्रभावशाली वैज्ञानिकों में गिना जाता है। जर्मनी में जन्मे आइंस्टीन सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी थे, जो रिलेटिविटी के सिद्धांत को विकसित करने के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने परमाणु बम के विकास में अप्रत्यक्ष, लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अब आइंस्टीन द्वारा 1952 में लिखा गया एक पत्र नीलामी के लिए उपलब्ध कराया जा रहा है। इस युद्ध-विरोधी पत्र में उन्होंने परमाणु बम को सबसे बड़ी गलती बताया है।

परमाणु बम

परमाणु बम के विकास में क्या थी आइंस्टीन की भूमिका?

आइंस्टीन सीधे तौर पर परमाणु बम विकसित करने में शामिल नहीं थे। हालांकि, अगस्त 1939 में उन्होंने राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट को एक पत्र लिखा था, जिसमें चेतावनी दी गई थी कि एडॉल्फ हिटलर और नाजी पार्टी परमाणु हथियार विकसित करने की कगार पर हैं। इसने रूजवेल्ट को अमेरिका में एक गुप्त परमाणु कार्यक्रम शुरू करने के लिए प्रेरित किया, जिसे मैनहट्टन प्रोजेक्ट नाम दिया गया। इसी तरह उन्होंने अमेरिका के पहले परमाणु बम के विकास में अहम भूमिका निभाई।

पछतावा

आइंस्टीन को जीवनभर रहा इस बात का पछतावा

आइंस्टीन ज्ञान और शांतिवाद में विश्वास रखते थे, यही कारण था कि परमाणु बम के बनने के बाद उन्हें अपने किए पर बेहद पछतावा हुआ था। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम समय में रूजवेल्ट को लिखे गए पत्र को अपनी सबसे बड़ी गलती बताया था। अब आइंस्टीन द्वारा 1952 में एक जापानी पत्रिका के लिए लिखा गया पत्र नीलाम होने वाला है, जिसका शीर्षक है 'परमाणु बम परियोजना में मेरी भागीदारी।'

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जानकारी

कब हो रही है इस पत्र की नीलामी?

इस ऐतिहासिक पत्र की नीलामी बोनहम्स नामक नीलामीघर द्वारा आयोजित की जा रही है। लोग इसे हासिल करने के लिए 24 जून तक बोली लगा सकेंगे। नीलामीकर्ताओं को उम्मीद है कि यह पत्र 86 लाख से एक करोड़ रुपये के बीच बिक सकता है।

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पत्र

आइंस्टीन ने क्यों लिखा था यह पत्र?

आइंस्टीन ने यह पत्र द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान लिखा था, जिसमें उन्होंने परमाणु हथियारों पर अपने विचार व्यक्त किए थे। यह पत्र आइंस्टीन के पुराने मित्र और जापानी पत्रिका 'काइजो' के संपादक कात्सु हारा के पत्रों के जवाब में लिखा गया था। उन्होंने आइंस्टीन से पूछा था, "आपने परमाणु बम के निर्माण में सहयोग क्यों किया, जबकि आप इसकी विनाशकारी शक्ति से अवगत थे?" कात्सु ने ये सवाल हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए परमाणु हमलों के बाद उठाए थे।

विचार

पत्र में आइंस्टीन ने की महात्मा गांधी की तारीफ

आइंस्टीन ने पत्र में लिखा, "मुझे कोई और रास्ता नहीं दिख रहा था। जर्मनी द्वारा पहले परमाणु हथियार बनाने की संभावना इतनी गंभीर थी कि हम इसे नजरअंदाज नहीं कर सकते थे।" पत्र में आइंस्टीन ने 'युद्ध के कट्टरपंथी उन्मूलन' की वकालत की। उन्होंने महात्मा गांधी को उस समय का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रतिभाशाली व्यक्ति भी बताया। भारत पर ब्रिटेन के औपनिवेशिक शासन के खिलाफ गांधी के अहिंसक आंदोलन की सराहना करते हुए उसे राजनीतिक कार्रवाई का आदर्श बताया।

प्रकाशन

जापानी, जर्मन और अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित हुआ था यह पत्र

कात्सु ने 1952 में इस पत्र को जर्मन भाषा में और जापानी अनुवाद के साथ प्रकाशित किया था। नीलामी में उपलब्ध होने वाला पत्र इसका पहला अंग्रेजी संस्करण है, जिसका अनुवाद 1953 में सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी हर्बर्ट जेले ने आइंस्टीन की मदद से किया था। इसमें नीचे की ओर आइंस्टीन के हस्ताक्षर मौजूद हैं और गलतियों को पेंसिल से ठीक भी किया गया है। जेले ने इस संस्करण को 'सोसाइटी फॉर सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी इन साइंस न्यूजलेटर' में प्रकाशित किया था।

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