
मंत्रिमंडल गठन के बाद लोकसभा अध्यक्ष पर टिकी निगाहें, जानिए किसे मिल सकता है मौका
क्या है खबर?
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार के मंत्रिमंडल गठन और विभागों के बंटवारे के बाद अब सबकी निगाहें लोकसभा अध्यक्ष की कुर्सी पर टिक गई है।
इस बार भाजपा चुनावों में बहुमत का आंकड़ा पार नहीं कर पाई और 240 सीटों पर ही रह गई।
इसका नतीजा यह है कि अब उसे लोकसभा अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए अपने सहयोगियों (विशेष रूप से TDP प्रमुख चंद्रबाबू नायडू और JDU प्रमुख नीतीश कुमार) को साथ लाने की जरूरत होगी।
खींचतान
लोकसभा अध्यक्ष पद के लिए हो सकती है खींचतान
गठबंधन में सरकार बनने से इस बार लोकसभा अध्यक्ष पद के चुनाव में खींचतान देखने को मिल सकती है।
इसका कारण है कि NDA के प्रमुख दल TDP और JDU दोनों इस कुर्सी को हथियाना चाहते हैं।
सरकार बनने से पहले दोनों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने अपनी मंशा भी जाहिर कर दी थी।
इसी तरह भाजपा इस बार भी यह कुर्सी अपने ही पास रखना चाहती है। ऐसे में लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव काफी रोचक हो सकता है।
जानकारी
भाजपा के पिछले दो कार्यकाल में ये रहे थे लोकसभा अध्यक्ष
भाजपा ने अपने पिछले दोनों कार्यकालों में अपने पार्टी के नेता को ही लोकसभा अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठाया था। 2014 से 2019 तक की सरकार में सुमित्रा महाजन और 2019-2024 वाली सरकार में ओम बिरला ने यह भूमिका निभाई थी।
प्रकिया
कैसे होता है लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 93 के अनुसार, नई लोकसभा की पहली बैठक से ठीक पहले अध्यक्ष पद खाली हो जाता है।
राष्ट्रपति नवनिर्वाचित संसदों को पद की शपथ दिलाने के लिए एक प्रोटेम स्पीकर नियुक्त करते हैं।
इसके बाद साधारण बहुमत से लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव किया जाता है। इसका मतलब है कि सदन में मौजूद आधे से अधिक सदस्यों को लोकसभा अध्यक्ष बनने के लिए किसी विशेष उम्मीदवार को वोट देना होगा।
भूमिका
क्या होती है लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका?
लोकसभा अध्यक्ष एक महत्वपूर्ण पद है। वह सदन संचालन का जिम्मेदार होता है। सदन में सत्तारूढ़ और विपक्षी दोनों दलों के सदस्य होते हैं। ऐसे में अध्यक्ष की कुर्सी गैर-पक्षपातपूर्ण होनी चाहिए।
हालांकि, अध्यक्ष एक निर्वाचित सदस्य है, जो किसी पार्टी का प्रतिनिधित्व करता है।
इसके बाद भी कुछ मौके ऐसे आए जब अध्यक्षों ने भूमिका संभालने से पहले पार्टी छोड़ दी।
एन संजीव रेड्डी ने मार्च 1967 में अध्यक्ष चुने जाने के बाद कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था।
नजर
TDP और JDU क्यों चाहते हैं अध्यक्ष पद?
TDP और JDU दोनों क्षेत्रीय दलों ने भाजपा को समर्थन देने के बदले में लोकसभा में अध्यक्ष पद की मांग की थी।
TDP और JDU दोनों को मंत्रिमंडल में दो-दो सीटें मिली हैं।
चूंकि, मोदी सरकार में भाजपा के साथ अन्य दल भी हितधारक हैं। ऐसे में कई बार सरकार को सदन के पटल पर संकट का सामना करना पड़ सकता है।
उस स्थिति में सदन के अध्यक्ष की भूमिका अहम होगी। ऐसे में सबकी निगाहें इस पर टिकी है।
जानकारी
लोकसभा अध्यक्ष के पास कौनसी शक्ति होती है?
कानून कहता है कि अध्यक्ष के पास दलबदल के मामलों में सदस्यों को अयोग्य घोषित करने की शक्ति है। गठबंधन सरकार में यह शक्ति बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। यही कारण है कि सभी प्रमुख दल इस पद को अपने पास रखना चाहते हैं।
बयान
विपक्षी नेताओं का क्या कहना है?
आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सदस्य संजय सिंह ने मांग की है कि लोकसभा अध्यक्ष का चयन TDP या किसी अन्य NDA गठबंधन सहयोगी से किया जाए। भाजपा का अध्यक्ष संसदीय परंपरा के लिए घातक होगा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने NDA सरकार में अपने सहयोगियों को बचे हुए विभाग देने के लिए भाजपा की आलोचना की है।
उन्होंने कहा, "आप शर्त लगा सकते हैं कि लोकसभा अध्यक्ष का पद भी भाजपा के पास ही रहेगा।"
संभावना
अध्यक्ष पद की दौड़ में कौन है सबसे आगे?
रिपोर्ट के अनुसार, भाजपा बिरला को ही अध्यक्ष बनाए रखना चाहती है। वह राजस्थान में कोटा से चुनाव जीतकर आए हैं।
अन्य नामों में दग्गुबाती पुरंदेश्वरी भी शामिल है। TDP संस्थापक एनटी रामा राव की बेटी दग्गुबाती आंध्र प्रदेश की भाजपा नेता हैं और प्रदेशाध्यक्ष हैं।
उन्होंने 2009 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय में राज्य मंत्री और 2012 में वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय में राज्य मंत्री की जिम्मेदारी संभाली थी।
उन्होंने लोकसभा चुनाव में राजमुंदरी से जीत दर्ज की है।