जस्टिस वर्मा बोले- आग लगने के समय घर में नहीं था, नकदी भी बरामद नहीं हुई
क्या है खबर?
नकदी कांड मामले में फंसे इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा ने संसदीय समिति के सामने अपना पक्ष रखा है। उन्होंने अपने बचाव में कई तर्क देते हुए कहा कि अगर पुलिस अपराध स्थल को सुरक्षित रखने में विफल रही, तो उन्हें महाभियोग का सामना क्यों करना चाहिए? उन्होंने ये भी दावा किया कि आग लगने के समय वह घर पर मौजूद नहीं थे और आवास से कोई नकदी बरामद नहीं हुई।
दलील
जस्टिस वर्मा ने कहा- नगदी बरामदगी में कोई भूमिका नहीं
रिपोर्ट के अनुसार, संसदीय समिति के सामने अपने जवाब में जस्टिस वर्मा ने कहा कि वे घटना स्थल पर सबसे पहले पहुंचने वाले व्यक्ति नहीं थे और जब पुलिस घटनास्थल को सुरक्षित करने में नाकाम रही, तो उन्हें कैसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। उन्होंने दावा किया कि नगदी बरामदगी में भी उनकी कोई भूमिका नहीं थी और घटनास्थल को सुरक्षित करने में घटनास्थल पर पहुंचने वाले पहले व्यक्ति विफल रहे।
पुलिस
पुलिस ने घटनास्थल को सील नहीं किया- जस्टिस वर्मा
जस्टिस वर्मा ने कहा कि आग लगने की घटनाओं में जिस तरह की कार्रवाई अपेक्षित होती है, पुलिस को वैसी कार्रवाई करनी चाहिए थी, लेकिन नहीं की। जस्टिस वर्मा के अनुसार, "पुलिस ने घटना स्थल को सील नहीं किया। पुलिस और फायर ब्रिगेड दोनों ही मौजूद थे, लेकिन उन्होंने जरूरी कार्रवाई नहीं की। शुरुआत में मौके से किसी भी तरह की बरामदगी नहीं हुई थी। अब यह कहा जा रहा है कि वहां नगदी मिली है।"
समिति
लोकसभा स्पीकर ने गठित की थी समिति
जुलाई, 2025 में लोकसभा के 140 से ज्यादा सांसदों ने जस्टिस वर्मा को पद से हटाने (महाभियोग) के लिए नोटिस दिया था। इसके स्वीकार होने के बाद 12 अगस्त, 2025 को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने आरोपों की जांच के लिए 3 सदस्यीय संसदीय समिति का गठन किया था। इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अरविंद कुमार, मद्रास हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मनिंद्र मोहन श्रीवास्तव और वरिष्ठ अधिवक्ता बीवी आचार्य शामिल हैं।
मामला
क्या है जस्टिस वर्मा से जुड़ा कैश कांड?
14 मार्च, 2025 को जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित आवास के स्टोर रूम में आग लग गई थी। आग बुझाने के लिए पहुंची टीमों को वहां पर 500 रुपये के नोटों के जले और अधजले बंडल मिले थे। जांच के लिए तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने 3 जजों की समिति बनाई थी, जिसने जस्टिस वर्मा को कदाचार का दोषी पाया। जस्टिस वर्मा द्वारा इस्तीफा देने से इनकार करने के बाद उन पर महाभियोग की कार्रवाई शुरू की गई।