सरकार ने दोषी नेताओं पर आजीवन प्रतिबंध लगाने का विरोध किया, सुप्रीम कोर्ट में क्या-क्या कहा?
क्या है खबर?
केंद्र सरकार ने दोषी राजनेताओं पर आजीवन प्रतिबंध लगाने की मांग वाली याचिका का सुप्रीम कोर्ट में विरोध किया है।
केंद्र ने कहा कि आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए गए नेताओं पर आजीवन चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाना सही नहीं होगा और इस तरह की अयोग्यता लागू करना पूरी तरह से संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है।
इस याचिका में दोषी सांसदों पर आजीवन प्रतिबंध लगाने की मांग की गई है।
हलफनामा
केंद्र ने क्या कहा?
केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा, "सांसदों की अयोग्यता पर फैसला करने का अधिकार पूरी तरह से संसद के पास है। याचिका में यह मांग की गई है, जो कानून को फिर से लिखने या संसद को एक विशेष तरीके से कानून बनाने का निर्देश देने के समान है, जो न्यायिक समीक्षा की शक्तियों से पूरी तरह परे है। आजीवन प्रतिबंध लगाना सही है या नहीं, यह पूरी तरह से संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है।"
अयोग्यता
6 साल की अयोग्यता ही काफी- केंद्र
केंद्र ने कहा, "वर्तमान में 6 वर्षों की अयोग्यता अवधि से बढ़कर आजीवन प्रतिबंध लगाना अनुचित कठोरता होगी और यह संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।"
केंद्र ने कहा कि न्यायपालिका संसद को किसी कानून में संशोधन करने या उसे लागू करने के लिए बाध्य नहीं कर सकती।
केंद्र ने मद्रास बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ के फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि कोर्ट संसद को कानून बनाने या संशोधन का निर्देश नहीं दे सकती।
मामला
क्या है मामला?
वरिष्ठ वकील अश्विनी उपाध्याय ने 2016 में सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की है। इसमें उन्होंने आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए गए नेताओं को 6 साल के लिए अयोग्यता को अपर्याप्त बताते हुए राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए दोषी विधायकों और सांसदों पर आजीवन प्रतिबंध लगाने की मांग की थी।
उन्होंने याचिका में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 और 9 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी।
जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा था जवाब
याचिका पर कोर्ट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा था।
कोर्ट ने कहा था, "जब किसी सरकारी कर्मचारी को दोषी ठहराया जाता है तो वह जीवन भर के लिए सेवा से बाहर हो जाता है तो फिर कोई दोषी शख्स संसद में फिर से कैसे जा सकता है? आखिर कानून तोड़ने वाले कानून बनाने का काम कैसे कर सकते हैं?"
मामले पर 4 मार्च को सुनवाई होगी।