Loading...
#NewsBytesExplainer: क्या पहचान छिपा सकती है पुलिस, सादे कपड़ों में तैनाती को लेकर क्या हैं नियम?

#NewsBytesExplainer: क्या पहचान छिपा सकती है पुलिस, सादे कपड़ों में तैनाती को लेकर क्या हैं नियम?

लेखन आबिद खान
Jul 22, 2026
07:33 pm

क्या है खबर?

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा दिल्ली में आयोजित विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस ने युवाओं पर लाठीचार्ज किया। इसमें कई लोग घायल हो गए। इस दौरान सोशल मीडिया पर कई वीडियो सामने आए, जिनमें दावा किया गया कि सादे कपड़ों में कुछ अनजान लोगों ने लाठियों से छात्रों को पीटा। इसी तरह के कई वीडियो में पुलिसकर्मियों की नेमप्लेट को लेकर भी विवाद हुआ। आइए इस संबंध में कानूनी पक्ष जानते हैं।

प्रदर्शन

प्रदर्शनों के दौरान क्या हुआ?

20 जुलाई को CJP ने संसद मार्च का आह्वान किया था। इस दौरान हजारों युवा संसद की ओर बढ़ने लगे, तो पुलिस ने उनकी झड़प हुई।

पुलिस ने लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले दागे। शाम तक सोशल मीडिया पर वीडियो आए, जिनमें दावा किया गया कि सादे कपड़ों में तैनात पुलिसकर्मियों ने छात्रों के साथ बर्बरता की।

कई पुलिसकर्मियों और केंद्रीय बलों के जवानों की वर्दी पर नेमप्लेट न होने को लेकर भी विवाद हुआ।

पहचान

क्या पहचान छिपा सकती है पुलिस?

कुछ खास तरह के बेहद निजी और संवेदनशील अभियानों के दौरान पुलिस या सुरक्षाबल अपनी पहचान छिपा लेते हैं। आमतौर पर ऐसा बदले की कार्रवाई से बचने और जवानों की गोपनीयता बनाए रखने के लिए होता है।

चूंकि, पहचान जाहिर होने से पुलिसकर्मियों को कानूनी मुकदमों, ऑनलाइन उत्पीड़न और उनके परिवारों को धमकियों का सामना करना पड़ सकता है।

हालांकि, ऐसा आम पुलिस अभियानों या कार्रवाईयों में नहीं किया जाता है।

ADVERTISEMENT

नियम

क्या कहते हैं नियम?

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के अध्याय 11 में सार्वजनिक व्यवस्था और शांति बनाए रखने के नियम हैं। हालांकि, इसमें स्पष्ट नहीं है कि पुलिसकर्मियों या जवानों को अपनी पहचान बतानी जरूरी है या नहीं।

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, सूत्रों का कहना है कि कानून के तहत सिर्फ मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी ही भीड़ को तितर-बितर कर सकते हैं। हथियारों से लैस अज्ञात लोगों की भीड़ कानूनी तौर पर किसी सार्वजनिक सभा को तितर-बितर होने के लिए नहीं कह सकती।

ADVERTISEMENT

कोर्ट

ऐसे मामलों में कोर्ट का क्या रुख रहा है?

1997 के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी और हिरासत के लिए सुरक्षा उपाय तय किए थे। इनमें यह शर्त भी शामिल थी कि गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी की पहचान साफ ​​और आसानी से दिखने वाली होनी चाहिए। हालांकि यह फैसला गिरफ्तारी से जुड़ा था।

2025 में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए पूछा था कि नागरिकों से यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वे सादे कपड़ों में पुलिस कर्मियों को पहचानें।

विशेषज्ञ

क्या कह रहे हैं विशेषज्ञ?

BBC से बात करते हुए उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह ने कहा, "इंटेलिजेंस विंग के लोग सादी वर्दी में रहते हैं, क्योंकि उनका काम जानकारी जुटाना होता है। सादी वर्दी में तैनात लोगों को पुलिसिंग की इजाजत नहीं होती। वे लाठी नहीं चला सकते, गोली नहीं चला सकते। कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि हालात अचानक बदलने पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी सादी वर्दी में पहुंच सकते हैं। उन्हें पहचाना जा सकता है।"

आलोचना

दिल्ली पुलिस की कार्रवाई की हो रही आलोचना

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के चेयर ऑफ बोर्ड आकार पटेल ने कहा, "दिल्ली पुलिस की कार्रवाई से गंभीर सवाल उठते हैं कि क्या उनका रवैया अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के तहत कानूनी, जरूरी और उचित था। हम दिल्ली पुलिस से संयम बरतने और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ गैरकानूनी बल का इस्तेमाल तुरंत बंद करने की अपील करते हैं। अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि गैरकानूनी व्यवहार के सभी आरोपों की तुरंत, स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से जांच हो।"

ADVERTISEMENT