#NewsBytesExplainer: UN ने क्यों बदला दुनिया का नक्शा, क्या वास्तव में बदल जाएगा देशों का आकार?
क्या है खबर?
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दुनिया के नक्शे को बदलने वाला प्रस्ताव पारित कर दिया है। इसमें पुराने मर्केटर वर्ल्ड मैप की जगह ऐसे नक्शे के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया गया है, जिसमें देशों और महाद्वीपों का आकार उनके असली क्षेत्रफल के लगभग समान दिखाई देता है। इस प्रस्ताव को टोगो ने पेश किया था, जिसका भारत समेत 164 देशों ने समर्थन किया। आइए जानते हैं नए नक्शे से क्या-क्या बदलेगा।
नया नक्शा
क्या है नया नक्शा?
नए नक्शे का नाम इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन है। इसमें देशों और महाद्वीपों को उनके वास्तविक सतही क्षेत्रफल के अनुपात में दिखाया जाता है। साथ ही उनकी पहचानने योग्य आकृतियों को भी बरकरार रखा जाता है।
इस नक्शे को 2018 में मानचित्रकारों के एक समूह द्वारा बनाया गया था।
इसके समर्थकों का कहना है कि यह पहले से अपनाई जा रही मर्केटर प्रणाली से जुड़े आकार संबंधी विकृतियों से बचते हुए दुनिया की अधिक सटीक समझ प्रदान करता है।
बदलाव
नए नक्शे से क्या-क्या बदलेगा?
नए नक्शे में अफ्रीका बड़ा दिखाई देगा, जबकि यूरोप और उत्तरी अमेरिका छोटे दिखाई देंगे। लैटिन अमेरिका, दक्षिण एशिया और ओशिनिया भी सापेक्ष रूप से बड़े दिखाई देंगे। एशिया के कुछ हिस्सों का आकार भी पहले से छोटा दिखेगा।
हालांकि, इससे देशों और महाद्वीपों के क्षेत्रफल पर कोई असर नहीं पड़ेगा। केवल नक्शे पर दिखने वाला उनका आकार पहले से थोड़ा छोटा या बड़ा दिख सकता है।
भारत
भारत पर क्या असर होगा?
भारत की वास्तविक जमीन, अंतरराष्ट्रीय सीमाओं या क्षेत्रफल में कोई बदलाव नहीं होगा। नक्शे में भारत की आकृति थोड़ी बदली हुई या कम खिंची हुई दिखाई दे सकती है।
दूसरे देशों की तुलना में भारत का आकार कुछ बड़ा दिखाई दे सकता है। खासतौर पर यूरोप, रूस, कनाडा जैसे ज्यादा उत्तरी देशों की तुलना में।
इससे देशों की सीमाओं पर कोई असर नहीं होगा केवल नक्शे पर पृथ्वी को दिखाने का तरीका बदल जाएगा।
वजह
क्यों बदला गया नक्शा?
दरअसल, अब तक नक्शे पर देशों-महाद्वीपों को दिखाने के लिए मर्केटर मैप का उपयोग किया जाता था, जिसे 1569 में फ्लेमिश मानचित्रकार गेरार्डस मर्केटर ने डिजाइन किया था। मुख्य रूप से इसका इस्तेमाल समुद्री नौवहन में होता था।
हालांकि, इसमें पूरी गोल धरती को सपाट नक्शे पर दिखाया गया था, जिसकी वजह से देशों और महाद्वीपों का आकार उनके असली क्षेत्रफल से बड़ा या छोटा दिखता था। खासतौर पर भूमध्य रेखा से दूर के इलाके बड़े दिखाई देते थे।
तकनीकी खामी
मर्केटर नक्शे में क्या थी तकनीकी खामी?
मर्केटर नक्शे में जैसे-जैसे कोई इलाका भूमध्य रेखा से दूर जाता है, वह ज्यादा बड़ा दिखाई देता है।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण ग्रीनलैंड और अफ्रीका है। मर्केटर नक्शे में ग्रीनलैंड आकार में लगभग अफ्रीका के बराबर दिखाई देता है, लेकिन असल में अफ्रीका ग्रीनलैंड से लगभग 14 गुना बड़ा है।
ग्रीनलैंड का क्षेत्रफल करीब 22 लाख वर्ग किलोमीटर है। वहीं, अफ्रीका का क्षेत्रफल करीब 3 करोड़ वर्ग किलोमीटर है। इसके बावजूद मर्केटर नक्शे में दोनों का आकार लगभग समान है।
अमेरिका
अमेरिका ने क्यों किया विरोध?
अमेरिका ने इस प्रस्ताव की आलोचना करते हुए कहा कि इस तरह के कदम इस संस्था की विश्वसनीयता खोने का कारण हैं।
मतदान से पहले अमेरिकी प्रतिनिधि यारीना फेरेंसेविच ने कहा, "वास्तविक समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय यह निकाय 16वीं शताब्दी की मानचित्र परियोजनाओं और क्षतिपूर्ति और संज्ञानात्मक न्याय को बढ़ावा देने में उनकी भूमिका पर बहस कर रहा है।"
उन्होंने आरोप लगाया कि यह प्रस्ताव 'वैचारिक एजेंडा' को बढ़ावा दे रहा है।
अफ्रीका
अफ्रीका क्यों चाहता था नक्शे में बदलाव?
अफ्रीकी संघ ने कहा, "सदियों से, मर्केटर प्रक्षेपण ने वैश्विक भूगोल को विकृत कर दिया है, जिससे अफ्रीका को ग्रीनलैंड के आकार तक सीमित कर दिया गया, जबकि वास्तव में हमारा महाद्वीप 14 गुना बड़ा है।"
अफ्रीका का कहना है कि यह केवल तकनीकी मुद्दा नहीं है, क्योंकि नक्शे क्षेत्रों के महत्व और वैश्विक प्रभाव को लेकर लोगों की धारणा को प्रभावित कर सकते हैं।
वहीं, टोगो ने इसे औपनिवेशिक काल की विरासतों का सामना करने के प्रयासों से जोड़ा।