#NewsBytesExplainer: पाकिस्तान क्यों कर रहे अमेरिका-ईरान वार्ता की मध्यस्थता, भारत पर क्या होगा असर?
क्या है खबर?
ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच चल रहे युद्ध को खत्म करने के लिए पाकिस्तान ने खुद को मध्यस्थ के तौर पर आगे किया है।पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा है कि उनका देश संघर्ष के समाधान के लिए सार्थक और निर्णायक वार्ता की सुविधा प्रदान करने के लिए तैयार है और ऐसा करने में सम्मानित महसूस करेगा। आइए समझते हैं पाकिस्तान कैसे मध्यस्थ बनकर उभरा और इसके भारत के लिए क्या मायने हैं।
बयान
वार्ता को लेकर पाकिस्तान ने क्या कहा?
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने 24 मार्च को सोशल मीडिया पर लिखा, 'अमेरिका और ईरान की सहमति पर पाकिस्तान सार्थक और निर्णायक वार्ता की मेजबानी करने के लिए तैयार और सम्मानित महसूस करता है।' अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुद इस पोस्ट को रीपोस्ट किया। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है इस हफ्ते के अंत में इस्लामाबाद में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल और ईरानी अफसरों की बैठक संभव है।अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस इसमें शामिल हो सकते हैं।
भूमिका
पाकिस्तान कैसे मध्यस्थ की भूमिका में आया?
द फाइनेंशियल टाइम्स के मुताबिक, 22 मार्च को पाकिस्तानी सेना प्रमुख असीम मुनीर ने ट्रंप से बात की थी। इसके अगले दिन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की ईरान के राष्ट्रपति से बात हुई। इसके बाद कुछ रिपोर्ट में दावा किया गया कि पाकिस्तान के आला अधिकारी ईरान और ट्रंप के दूत स्टीव विटकॉफ और दामाद जेरेड कुशनर के संपर्क में हैं। पिछले हफ्ते पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने भी कहा कि उनका देश अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता कर रहा है।
वजह
पाकिस्तान को क्यों मिली ये भूमिका?
पाकिस्तान के अमेरिका और ईरान दोनों के साथ करीबी रिश्ते हैं। हालिया समय में मुनीर और ट्रंप करीब आए हैं। मुनीर ने जून, 2025 में व्हाइट हाउस में ट्रंप से मुलाकात की थी। तब पहली बार कोई पाक सेना प्रमुख अमेरिकी राष्ट्रपति से मिला था। वहीं, ईरान के बाद शियाओं की सबसे ज्यादा आबादी पाकिस्तान में है। पाकिस्तान ने आयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या की निंदा की थी। इस तरह पाकिस्तान एक न्यूट्रल पोजिशन में है।
अन्य वजह
इन वजहों से भी पाकिस्तान के पक्ष में समीकरण
शिया और सुन्नी देशों में पाकिस्तान की स्थिति न्यूट्रल मानी जाती है। पाकिस्तान सुन्नी देशों का अगुवा माने जाने वाले सऊदी अरब के साथ दोस्ताना व्यव्हार रखता है। ईरान के साथ उसकी 900 किलोमीटर लंबी सीमा है। परमाणु शक्ति संपन्न देश होने के चलते भी पाकिस्तान की भूमिका बढ़ी है। जानकारों का मानना है कि युद्धविराम को लेकर पाकिस्तान पर किसी बड़े देश का दबाव नहीं, क्योंकि सभी देश जंग जल्द खत्म होते देखना चाहते हैं।
फायदा
अगर वार्ता सफल हुई, तो पाकिस्तान को क्या फायदा होगा?
पाकिस्तान अगर सफलतापूर्वक मध्यस्थता करा देता है, तो अमेरिका के ऊपर उसका विश्वास और बढ़ेगा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छवि बेहतर होगी। दैनिक भास्कर से बात करते हुए ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन से जुड़े विवेक मिश्र ने कहा, "पाकिस्तान को सबसे बड़ा फायदा ये है कि अमेरिका से आर्थिक मदद बढ़ सकती है। ईरान से भी कुछ समय से जो रिश्ते ठीक नहीं थे, वो बेहतर हो सकते हैं। आर्थिक तौर पर जूझ रहे पाकिस्तान के लिए ये बड़ी राहत होगी।"
भारत
भारत पर क्या होगा असर?
विवेक के मुताबिक, भारत में घरेलू मोर्चे पर एक संदेश जा सकता है कि भारत की बजाय पाकिस्तान की कोशिशें सफल हुईं। हालांकि, विवेक का मानना है कि व्यापक स्तर पर इसका कोई असर नहीं होगा और भारत के अमेरिका और ईरान से जैसे रिश्ते हैं, वो बने रहेंगे। वहीं, JNU के प्रोफेसर राजन कुमार ने कहा, "युद्ध रोकने को लेकर भारत ने कोई कोशिश नहीं की। अब तक भारत की नीति निजी हितों को प्राथमिकता देने की रही है।"