ट्रंप के आह्वान पर भी ईरान के खिलाफ युद्ध क्यों नहीं लड़ रहे NATO देश?
क्या है खबर?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 15 मार्च को अपने उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) सहयोगियों से अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ शुरू किए गए युद्ध में शामिल होने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि अगर NATO सहयोगी होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने में अमेरिका की मदद करने से इनकार करते हैं, तो उन्हें बहुत बुरे भविष्य का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, उनके इस बयान के बाद भी NATO देश आगे नहीं आए हैं। आइए इसका कारण जानते हैं।
बयान
ट्रंप ने NATO को लेकर क्या दिया था बयान?
द फाइनेंशियल टाइम्स को दिए एक साक्षात्कार में ट्रंप ने कहा था, "NATO सहयोगियों को होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने में उनकी मदद करनी होगी। NATO देश ईरान के खिलाफ अमेरिका के साथ नहीं आते हैं तो उनको बहुत बुरे भविष्य का सामना करना पड़ सकता है।" उन्होंने आगे कहा था, "यह उचित ही है कि जो लोग इस जलडमरूमध्य से लाभान्वित होते हैं, वे यह सुनिश्चित करने में मदद करें कि वहां कुछ भी बुरा न हो।"
खारिज
NATO देशों ने ठुकराई मांग
ट्रंप के बयान पर NATO में अमेरिका के अन्य सहयोगियों ने कड़ा रुख अपनाया है। जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने कहा कि यह युद्ध NATO का मामला नहीं है, जबकि NATO ने कहा कि सहयोगी देशों ने भूमध्य सागर में अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करने के लिए पहले ही कदम उठा लिए हैं। ब्रिटेन, इटली, जर्मनी, कनाडा और फ्रांस के नेताओं ने भी एक संयुक्त बयान जारी कर लेबनान पर इजरायल द्वारा किए गए आक्रमण पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।
NATO
क्या है NATO?
NATO अमेरिका और उसके सहयोगियों का एक सैन्य गठबंधन है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 4 अप्रैल, 1949 को एक संधि के जरिए इसका गठन हुआ था। अमेरिका, फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम (UK) समेत कुल 12 देशों ने इसकी स्थापना की थी। अभी सदस्यों की संख्या 32 है। अमेरिका और कनाडा को छोड़कर सभी सदस्य यूरोपीय हैं। NATO का अनुच्छेद-5 कहता है कि अगर कोई NATO देश पर हमला करता है तो इसे सभी देशों पर हमला माना जाता है।
कारण
अमेरिका का साथ क्यों नहीं दे रहे NATO के सदस्य देश?
मौजूदा युद्ध के मापदंड NATO चार्टर के नियमों का उल्लंघन दर्शाते हैं। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद-1 के तहत, सदस्य देश जिन भी अंतरराष्ट्रीय विवादों में शामिल हैं, उनका समाधान शांतिपूर्ण तरीकों से करेंगे, जिससे अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा और न्याय को खतरा न हो। सदस्यों से अपेक्षा है कि वे संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों के विपरीत बल प्रयोग या धमकी का उपयोग करने से बचें। वर्तमान संघर्ष इसका स्पष्ट उल्लंघन है, जिसके परिणाम वैश्विक स्तर पर दिख रहे हैं।
अनुच्छेद-5
अनुच्छेद-5 NATO देशों में युद्ध में शामिल होने से कैसे रोक रहा?
किसी सदस्य देश पर हमले की स्थिति में जवाबी कार्रवाई को अनिवार्य बनाने वाला अनुच्छेद-5 का प्रयोग भी केवल रक्षा उपाय के रूप में सशस्त्र हमले के जवाब में ही किया जा सकता है। 9/11 के बाद अन्य सहयोगी देश अफगानिस्तान में अमेरिकी आक्रमण में शामिल होने के लिए बाध्य नहीं थे, बल्कि उन्होंने अमेरिका द्वारा गठित सहयोगी देशों के गठबंधन में शामिल होने का विकल्प चुना, जिसमें व्यक्तिगत सहयोगी देशों ने अपना समर्थन देने का वादा किया।
अन्य
अनुच्छेद-6 भी NATO देशों को युद्ध में शामिल होने से रोक रहा
NATO चार्टर के अनुच्छेद-6 के तहत गठबंधन के सामूहिक रक्षा दायित्व केवल विशिष्ट क्षेत्रों पर लागू होते हैं। इनमें व्यापक रूप से यूरोप और उत्तरी अमेरिका में सदस्य देशों के क्षेत्र, तुर्की और कर्क रेखा के उत्तर में स्थित उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र, जिसमें भूमध्य सागर में उनकी सेनाएं और युद्ध पोत शामिल हैं। ऐसे में ईरान और उसके आसपास चल रहा वर्तमान संघर्ष इन सीमाओं से पूरी तरह बाहर है। ऐसे में NATO देश इसमें शामिल नहीं हो रहे हैं।
रुख
मौजूदा स्थिति पर NATO का रुख
अब तक NATO के सदस्य देशों ने अनुच्छेद-5 का हवाला दिए बिना रसद और मिसाइल रक्षा जैसे सहायक समर्थन तक ही अपनी भूमिका सीमित रखी है। युद्ध की शुरुआत में NATO महासचिव मार्क रुट्टे ने इस बात पर जोर दिया था कि NATO के शामिल होने की बिल्कुल कोई योजना नहीं है। हालांकि, सहयोगी देश मिलकर इजरायल के साथ जो कर रहे हैं, उसमें सहयोग करने के लिए अपनी तरफ से हर संभव प्रयास कर सकते हैं।
शिकायत
ट्रंप की NATO से पहले भी रही है शिकायतें
ट्रंप अपने पहले राष्ट्रपति कार्यकाल से ही दावा करते रहे हैं कि NATO के अन्य सदस्य देशों ने गठबंधन के साझा रक्षा बजट में अमेरिका जितना योगदान नहीं दिया है। 2006 से प्रत्येक सदस्य देश पर अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का कम से कम 2 प्रतिशत रक्षा पर खर्च करने की शर्त है, जबकि 2014 में एक औपचारिक घोषणा में कहा गया कि जो देश इस लक्ष्य को पूरा नहीं कर रहे हैं, वे एक दशक में इसे बढ़ाएंगे।
जानकारी
NATO में अमेरिका का हिस्सा
NATO के आंकड़ों के अनुसार, 2024 में कुल रक्षा व्यय में अमेरिकी रक्षा व्यय का हिस्सा 63 प्रतिशत था, जो 2016 में 72 प्रतिशत था। हालांकि, दोनों आंकड़े काफी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन रक्षा पर खर्च के मामले में अमेरिका छठे स्थान पर है।
दावा
ट्रंप ने दावाेस में किया था चौंकाने वाला दावा
ट्रंप ने जनवरी 2026 में दावोस में दावा किया कि 2 प्रतिशत की शर्त के बावजूद अधिकांश देश इसे पूरा नहीं कर रहे थे। हालांकि, बाद में आंकड़े गलत निकले। गैर-अमेरिकी सदस्यों द्वारा रक्षा खर्च 2016 में 292 अरब डॉलर से बढ़कर 2024 में 482 अरब डॉलर हो गया। 2024 में NATO के 31 सदस्यों में से 18 ने 2 प्रतिशत रक्षा खर्च के लक्ष्य को पूरा किया, जो 2016 में 4 और 2020 में 8 सदस्यों से अधिक है।