डोनाल्ड ट्रंप को मिला सांसदों का साथ, संसद से खारिज हुआ ईरान युद्ध रोकने वाला विधेयक
क्या है खबर?
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रही जंग को 6 दिन हो गए हैं। अभी भी हमले जारी हैं। इस बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिकी सांसदों का साथ मिला है। ईरान में युद्ध सीमित करने के लिए अमेरिकी संसद में लाए गए एक विधेयक को मंजूरी नहीं मिल पाई है। राष्ट्रपति की शक्तियां सीमित करने वाले इस विधेयक में सैन्य कार्रवाई से पहले कांग्रेस (संसद) की मंजूरी लेना जरूरी करने की मांग की गई थी।
विधेयक
प्रस्ताव के विरोध में 53, पक्ष में 47 सांसद
संसद में प्रस्ताव के खिलाफ 53 वोट पड़े। वहीं, 47 सांसदों ने प्रस्ताव का समर्थन किया। संसद में रिपब्लिकन पार्टी को मामूली बहुमत को देखते हुए पहले से ही प्रस्ताव के पारित होने की उम्मीदें कम थीं। एक को छोड़कर सभी रिपब्लिकन सांसदों ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। केंटकी के रिपब्लिकन सीनेटर रैंड पॉल ने पार्टी लाइन से अलग जाकर प्रस्ताव का समर्थन किया। इसी तरह पेंसिल्वेनिया के डेमोक्रेटिक सीनेटर जॉन फेटरमैन को छोड़कर सभी डेमोक्रेट्स ने समर्थन किया।
बयान
सांसदों ने क्या कहा?
इडाहो के रिपब्लिकन सीनेटर जिम रिश ने कहा, "यह कोई अंतहीन युद्ध नहीं है। यह बहुत जल्द समाप्त होने वाला है।" डेमोक्रेटिक नेता चक शूमर ने कहा, "यह वोट तय करेगा कि सांसद मध्य-पूर्व के अंतहीन युद्धों से थके अमेरिकी लोगों के साथ खड़े हैं या राष्ट्रपति ट्रंप और रक्षा मंत्री हेगसेथ के साथ।" रिपब्लिकन नेता जॉन बरासो ने कहा, "डेमोक्रेट्स राष्ट्रपति को रोकने की कोशिश कर रहे हैं। असली मुद्दा ईरान का परमाणु कार्यक्रम खत्म करना है।"
प्रावधान
विधेयक में क्या-क्या प्रावधान थे?
विधेयक अगर पारित होता, तो ट्रंप को ईरान पर किसी भी बड़े हमले से पहले संसद की मंजूरी लेनी जरूरी होती। डेमोक्रेट्स ने तर्क दिया कि ट्रंप की हरकतें सैन्य बल का उपयोग करने के लिए कांग्रेस के अधिकार की अवहेलना करने का एक और उदाहरण था, चूंकि ट्रंप के पास आगे बढ़ने के लिए एक स्पष्ट रणनीति का अभाव था और ऐसा कर उन्होंने पिछले कई वादों की तरह एक और वादा तोड़ दिया।
प्लस
न्यूजबाइट्स प्लस
अमेरिकी संविधान के तहत राष्ट्रपति 'कमांडर-इन-चीफ' होते हैं, लेकिन युद्ध की औपचारिक घोषणा करने की शक्ति संसद (कांग्रेस) के पास होती है। 1973 के 'वॉर पावर्स रेजोल्यूशन' कानून के मुताबिक, किसी भी सैन्य कार्रवाई के लिए राष्ट्रपति को कांग्रेस से मंजूरी लेनी जरूरी है। बिना मंजूरी के तैनात की गई सेना को 60 दिनों के भीतर वापस बुलाना होगा। जब तक संघर्ष जारी रहता है, तब तक राष्ट्रपति को लगातार संसद के साथ परामर्श करना होता है।