हिमाचल प्रदेश के इस गांव में कुछ भी छूना है मना, नहीं चलता भारत का कानून
क्या है खबर?
हिमाचल प्रदेश की वादियों में एक छोटा-सा गांव बसा हुआ है, जिसकी खूबसूरती देखकर आप मंत्रमुग्ध हो जाएंगे। हम बात कर रहे हैं मलाणा की, जो कुल्लू जिले का एक रहस्यमयी गांव है। यहां आने वाले यात्रियों को कुछ भी छूने की इजाजत नहीं दी जाती है और यहां भारत का कानून भी नहीं चलता है। जी हां, यह दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्रों में से एक है। आइए इस अनोखे गांव और इसके कानूनों के बारे में जानते हैं।
छूना
गांव की चीजों और लोगों को छूने की है मनाही
जहां पूरे भारत में 'अतिथि देवो भव' की प्रथा चलती है, वहीं मलाणा के लोग अतिथियों से दूरी बनाना पसंद करते हैं। यहां आपको जगह-जगह पर साइन बोर्ड मिल जाएंगे, जिन पर साफ लिखा होता है कि 'कुछ भी छूना मना है'। आप गांव के घरों, दुकानों और मंदिरों के साथ-साथ यहां के लोगों को भी हाथ नहीं लगा सकते। सामान आदि खरीदते समय पैसे भी स्थानीय लोगों के हाथों के बजाय जमीन पर रखने होते हैं।
कारण
क्या है इस अजीब कानून का कारण?
मलाणा में जो यात्री किसी घर या व्यक्ति को छूने की गलती कर बैठता है, उसे 1500 रुपये से अधिक का जुर्माना भरना पड़ता है। इसका कारण साफ-सफाई बनाए रखना नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही जाति प्रथा है। मलाणा के लोग खुद को सिकंदर महान के वंशज मानते हैं और बाहरी लोगों को अपवित्र समझते हैं। यात्रियों से जो जुर्माना लिया जाता है, उससे जानवर खरीदा जाता है और शुद्धिकरण के नाम पर उसकी बली दी जाती है।
कानून
कौन बनाता है इस गांव के कानून?
जैसा कि हमने पहले बताया, मलाणा के लोग भारत का कानून नहीं मानते हैं। इस गांव में उनका खुद का कानून चलता है, जिसे बड़े-बूढ़ों की एक परिषद तय करती है। परिषद में कुल 11 लोग होते हैं, जो उनके पौराणिक देवता जमलू ऋषि के आदेशों का पालन करते हैं। गांव के हर एक सदस्य को इन बुजुर्गों के फैसले सिर-आखों पर रखने होते हैं और वे पत्थर की लकीर होते हैं।
बदलाव
एक अनोखी भाषा में बात करते हैं इस गांव के लोग
हिमाचल प्रदेश में आम तौर पर हिंदी, कांगड़ी, कुल्लूई, मंडेली और सिरमौरी जैसी भाषाएं बोली जाती हैं। हालांकि, मलाणा के लोग एक ऐसी भाषा में बात करते हैं, जो उनके अलावा कोई नहीं समझ सकता। इसको 'कनाशी' कहते हैं, जिसमें ग्रीक भाषा के कुछ शब्द इस्तेमाल होते हैं। वैसे तो यहां के लोग परिषद के फैसले मानते हैं, लेकिन अब बदलाव आ रहे हैं। कुछ स्थानीय लोग फैसलों से परेशान हो कर कुल्लू जिला अदालत के दरवाजे खटखटा चुके हैं।