7 सांसदों का जाना AAP के लिए कितना बड़ा झटका, आगे क्या हैं चुनौतियां?
क्या है खबर?
बीते दिन अरविंद केजरीवाल को आम आदमी पार्टी (AAP) के इतिहास के सबसे बड़े झटके का सामना करना पड़ा है। राघव चड्ढा समेत AAP के 7 राज्यसभा सांसद भाजपा में शामिल हो गए। राघव न सिर्फ पार्टी छोड़कर गए, बल्कि अपने साथ राज्यसभा में AAP की ताकत का बड़ा हिस्सा भी ले गए। 2012 में पार्टी की स्थापना के बाद इसे अब तक का सबसे गंभीर संकट माना जा रहा है। आइए AAP के लिए आगे का रास्ता समझते हैं।
झटका
पार्टी के संस्थापक सदस्यों में थे राघव और मालीवाल
जिन 7 सांसदों ने पार्टी छोड़ी हैं, उनमें से कई पार्टी की स्थापना के समय से साथ थे। राघव और स्वाति मालीवाल पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से थे। बाकी भी पार्टी की नीतिगत चर्चाओं, संगठनात्मक रणनीति, वित्तीय प्रबंधन और जनसंपर्क सहित कई अहम गतिविधियों को आकार देने का जिम्मा निभा रहे थे। ऐसे में इन सभी का जाना केवल सामान्य राजनीतिक बदलाव नहीं है, बल्कि संगठनात्मक उथल-पुथल का संकेत है।
राज्यसभा
राज्यसभा में AAP की उपस्थिति लगभग खत्म
7 सांसदों की बगावत से पहले राज्यसभा में AAP के 10 सांसद थे। अब केवल 3 बचे हैं। AAP के लिए यह केवल एक बगावत नहीं, बल्कि उपरी सदन में उसकी मौजूदगी का लगभग पूरी तरह खात्मा है। राघव अपने साथ पार्टी के दो तिहाई सदस्यों को लेकर भाजपा में गए हैं। ये आंकड़ा बेहद अहम है, चूंकि इतने सदस्यों पर दलबदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई नहीं होती। यानी AAP चाहकर भी इनकी सदस्यता रद्द नहीं कर सकती।
दिल्ली
दिल्ली विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी को लगातार झटके
दिल्ली विधानसभा चुनाव में AAP को हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद पार्टी की सत्ता केवल पंजाब तक सीमित रह गई। शुक्रवार के विद्रोह ने राज्यसभा में उसकी ताकत को और कमजोर कर दिया। 2024 के लोकसभा चुनावों में AAP पंजाब में केवल 3 सीटें ही जीत पाई थीं। अब इस उठापटक के बाद पार्टी के दोनों सदन में केवल 6 ही सांसद बचे हैं और अहम राज्यों में चुनाव सर पर हैं।
पंजाब
पंजाब चुनावों पर क्या होगा असर?
अगले साल पंजाब में विधानसभा चुनाव हैं। जिन 7 राज्यसभा सांसदों ने पार्टी छोड़ी हैं, उनमें से 6 पंजाब से थे। खुद राघव ने 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में पार्टी की जीत में अहम भूमिका निभाई थी। दिल्ली के बाद पंजाब दूसरा राज्य था, जहां AAP सरकार बनाने में सफल हुई थी। अब पंजाब में पार्टी के लिए चुनौती कड़ी हो सकती है। भाजपा की कोशिश दिल्ली के बाद पंजाब से AAP को हटाने को होगी।
टूट
दिल्ली में विधायकों के टूटने का खतरा
इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, सबसे बड़ी चिंता दिल्ली में AAP विधायकों का पार्टी छोड़ने का खतरा है। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों को डर है कि इस विद्रोह के बाद 5 से 7 AAP विधायक पाला बदल सकते हैं। यह इसलिए अहम है, क्योंकि दिल्ली विधानसभा में AAP के केवल 22 विधायक हैं। दिल्ली AAP के लिए सिर्फ एक राज्य नहीं, यह पार्टी का राजनीतिक आधार और पहचान है, जो लगातार कमजोर होता जा रहा है।
आगे का रास्ता
क्या है पार्टी के लिए आगे का रास्ता?
केजरीवाल के लिए फिलहाल सबसे पहली प्राथमिकता और लोगों को पार्टी छोड़ने से रोकना है। खासतौर पर दिल्ली में विधायकों की टूट रोकी जाए, क्योंकि जरा सा नुकसान पार्टी की विधायी स्थिति को बड़ी चोट पहुंचा सकता है। गुजरात, गोवा और पंजाब में चुनाव नजदीक आने के साथ ही AAP के सामने तात्कालिक चुनौती संगठन को स्थिर करना, टीम का पुनर्निर्माण करना और कार्यकर्ताओं को आश्वस्त करना कि उसका राजनीतिक आंदोलन अभी भी जीवित है।