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#NewsBytesExplainer: केरलम में क्यों होती हैं भूस्खलन की इतनी घटनाएं?
केरलम में हर साल भूस्खलन में दर्जनों लोगों की जान जाती है (फाइल तस्वीर)

#NewsBytesExplainer: केरलम में क्यों होती हैं भूस्खलन की इतनी घटनाएं?

लेखन आबिद खान
Aug 02, 2026
04:58 pm

क्या है खबर?

भारी बारिश के बीच केरलम में फिर भूस्खलन की घटनाएं बढ़ने लगी हैं। बीते दिन राज्य के कुछ हिस्सों में भूस्खलन और बारिश से जुड़ी घटनाओं में कम से कम 8 लोगों की मौत हो गई है। पिछले महीने वायनाड में भी भूस्खलन ने 8 लोगों की जान ले ली थी। राज्य में हर साल बारिश के दौरान भूस्खलन में दर्जनों लोगों को जान गंवानी पड़ती है। आइए जानते हैं केरलम में इतने भूस्खलन क्यों होते हैं।

भूस्खलन

सबसे पहले जानिए क्यों होता है भूस्खलन?

ढलान से चट्टानों, पत्थरों, मिट्टी या मलबे का अचानक नीचे खिसकना भूस्खलन कहलाता है। इसके पीछे आमतौर पर 2 वजहें मानी जाती हैं।

पहला वो कारण, जो प्राकृतिक रूप से भूस्खलन के लिए जिम्मेदार होते हैं। जैसे- मिट्टी की बनावट, चट्टानें, भू संरचना और ढलान वगैरह।

दूसरे वे तात्कालिक कारण होते हैं, जिनसे भूस्खलन होता है। इनमें बेतरतीब ढंग से जमीन का इस्तेमाल, अवैज्ञानिक निर्माण और बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई जैसे कारण शामिल हैं।

केरलम

केरलम में क्यों होते हैं ज्यादा भूस्खलन?

केरलम के पश्चिमी घाट वाले इलाकों में ज्यादा भूस्खलन होता है। यहां खड़ी ढलानें, भूसंरचना और जमीन के इस्तेमाल में बदलाव इसके बड़े जिम्मेदार हैं।

इंडियन एक्सप्रेस से केरल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर केएस साजिनकुमार ने कहा, "जब बहुत तेज या लंबे समय तक बारिश होती है, तो पानी ढीली मिट्टी में रिसकर मिट्टी और उसके नीचे की चट्टान के बीच पहुंच जाता है। इससे दोनों के बीच की पकड़ कमजोर हो जाती है और भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है।"

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भूसंरचना

भूसरंचना भी जिम्मेदार

साजिनकुमार के मुताबिक, घाटों की जमीन में 2 परतें हैं- नीचे सख्त चट्टानें, उसके ऊपर मिट्टी।

पानी मिट्टी और चट्टान की परतों के बीच बहता है। इससे मिट्टी को चट्टानों से जोड़े रखने वाली ताकत कमजोर हो जाती है और मिट्टी खिसकने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

उन्होंने कहा, "पहले हुई बारिश से ढलानें धीरे-धीरे पानी सोख लेती हैं और उसके बाद अचानक हुई भारी बारिश से बहाव बढ़ जाता है और जमीन धंसने का खतरा बढ़ जाता है।"

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विकास

विकास परियोजनाओं ने बिगाड़ा प्राकृतिक संतुलन

जुलाई में वायनाड में सुरंग परियोजना के नजदीक भूस्खलन हुआ था। तब पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने सुरंग के निर्माण के दौरान हुई पेड़ों की कटाई, धमाकों और कंपन मशीनों के इस्तेमाल को इसकी वजह बताया था।

दरअसल, ये इलाका पर्यावरण और भूस्खलन के हिसाब से बेहद संवेदनशील है। इन इलाकों को माधव गाडगिल रिपोर्ट में पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र (ESZ) घोषित किया गया है।

ऐसे में यहां विकास परियोजनाएं पूरे पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान पहुंचाती हैं।

जलवायु परिवर्तन

जलवायु परिवर्तन ने बदला बारिश का मिजाज

जलवायु परिवर्तन की वजह से बारिश का पैटर्न बदला है। अब मानसून के दौरान कम समय में बहुत भारी और अनिश्चित बारिश होती है। ऐसे में अचानक आए पानी को जमीन सोख नहीं पाती।

केरल वन अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक डॉक्टर टीवी संजीव ने BBC से कहा, "यहां की जमीन बहुत नाज़ुक है। यहां गहरी खाई हैं। बारिश तेज बारिश में बदल रही है और जमीन इतनी नाज़ुक हो गई है कि वो भारी बारिश सहन नहीं कर पा रही।"

घटनाएं

केरलम में कब-कब भूस्खलन ने मचाई तबाही

30 जुलाई, 2024 को वायनाड में हुए भूस्खलन में 400 से ज्यादा लोग मारे गए थे, 187 घायल हुए थे और 100 से ज्यादा का अभी तक कोई पता नहीं है।

इसी साल 7 जुलाई को वायनाड में ही भूस्खलन में 8 लोग मारे गए थे।

2019 में चूरलमाला-मुंडक्कई क्षेत्र से लगभग 10 किलोमीटर दूर हुए भूस्खलन में 17 लोगों की मौत हो गई थी।

2015 से 2022 के बीच केरलम में भूस्खलन के 3,782 मामले सामने आए थे।

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