#NewsBytesExplainer: डोनाल्ड ट्रंप के न्योते के बावजूद गाजा शांति बोर्ड में शामिल क्यों नहीं हुआ भारत?
क्या है खबर?
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 'गाजा शांति बोर्ड' में 17 देशों को शामिल करा लिया है। स्विट्जरलैंड के दावोस में इस बोर्ड के चार्टर पर इन देशों ने हस्ताक्षर कर दिए हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने इस बोर्ड में शामिल होने के लिए भारत को भी न्योता भेजा था। हालांकि, भारत ने न तो न्योते को पूरी तरह खारिज किया है और न ही स्वीकार किया है। आइए जानते हैं भारत का रणनीति क्या है।
बोर्ड
सबसे पहले जानिए क्या है 'गाजा शांति बोर्ड'?
दरअसल, इजरायल-हमास ने गाजा पट्टी में युद्धविराम के लिए अक्टूबर 2025 में हस्ताक्षर किए थे। उसी के तहत दूसरे चरण में 'शांति बोर्ड' का अनावरण हुआ है। यह अंतरराष्ट्रीय निकाय है, जिसे इजरायल-हमास युद्ध विराम की निगरानी के लिए नवंबर 2025 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने अनुमोदित किया था। इसमें 3 परस्पर संबंधित निकाय, जिसमें मुख्य शांति बोर्ड, फिलिस्तीनी तकनीकी समिति और गाजा कार्यकारी बोर्ड शामिल है। ट्रंप आजीवन इसके अध्यक्ष रहेंगे।
भारत
बोर्ड में क्यों शामिल नहीं हुआ भारत?
इंडियन एक्सप्रेस को सूत्रों ने बताया कि भारत के पास तुरंत बोर्ड में शामिल न होने के कई कारण हैं। इनमें बोर्ड में शामिल अन्य देश और उनके भारत के साथ संबंध, बोर्ड की वैधता, UN फ्रेमवर्क और बहुपक्षवाद के लिए चुनौती, बोर्ड का दायरा और काम, इजरायल-फिलिस्तीन मुद्दा और द्विराष्ट्र सिद्धांत पर भारत का अपना रुख और बोर्ड में शामिल होने या न होने को लेकर ट्रंप की प्रतिक्रिया शामिल है।
चिंताएं
क्या हैं भारत की चिंताएं?
हिंदुस्तान टाइम्स ने मामले के जानकार लोगों के हवाले से बताया कि एक ओर भारत फ्रांस और रूस सहित प्रमुख साझेदारों के फैसले पर नजर रख रहा है, तो दूसरी ओर शांति बोर्ड द्वारा संयुक्त राष्ट्र (UN) को कमजोर करने और ट्रंप के अनिश्चित काल तक इस संस्था के अध्यक्ष बने रहने को लेकर चिंताएं भी हैं। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, फिलहाल बोर्ड के पास न ताकत है और न वैधता। इसलिए भारत इंतजार करने की रणनीति अपना रहा है।
असमंजस
भारत के लिए क्यों है असमंजस की स्थिति?
बोर्ड को लेकर भारत की दुविधा उसकी विदेश नीति के सिद्धांतों, फिलिस्तीन मुद्दे पर रुख, ऐसे बोर्ड में शामिल होने के रणनीतिक फायदों और अमेरिका के साथ कूटनीतिक संबंधों को लेकर है। अगर यह बोर्ड UN फ्रेमवर्क को कमजोर करने की कोशिश करता है, तो UN और बहुपक्षवाद के प्रति भारत की प्रतिबद्धता की चुनौती होगी। बोर्ड के चार्टर में गाजा का जिक्र ही नहीं है यानी संभव है कि ये दूसरी लड़ाइयों को भी अपने दायरे में लेगा।
अनिश्चितताएं
बोर्ड में काम और फैसलों को लेकर कुछ तय नहीं
अभी यह तय नहीं है कि बोर्ड के फैसले कौन लेगा। इसकी कार्यकारी परिषद के 7 सदस्यों में से 6 अमेरिकी हैं। ट्रंप खुद इसके आजीवन अध्यक्ष हैं। ऐसे में बोर्ड में सलाह-मशवरे से फैसले होने को लेकर संदेह है। एक चिंता ये भी है कि ट्रंप इसे ड्रीम प्रोजेक्ट की तरह चला रहे हैं। जिन दिन ट्रंप बाहर हुए, बोर्ड का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। ऐसी स्थिति में भारत बोर्ड में फंसा रह जाएगा।
विशेषज्ञ
जानकारों का क्या मत है?
दैनिक भास्कर से बात करते हुए JNU में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर राजन कुमार ने कहा, "पाकिस्तान बोर्ड में है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत-पाकिस्तान का साथ काम करना मुश्किल होगा। इजरायल से भारत के अच्छे संबंध हैं। इजरायल बोर्ड से संतुष्ट नहीं है, इसलिए भारत को कूटनीतिक तरीके से इजरायल को भी साधना होगा। बोर्ड में अमीर कारोबारी भी शामिल हैं। इसलिए इसकी छवि व्यापारिक संगठन जैसी ज्यादा है।"
जानकारी
बोर्ड में कौन-कौनसे देश शामिल है?
ट्रंप के 'गाजा शांति बोर्ड' के चार्टर पर हस्ताक्षर करने वाले देशों में अर्जेंटीना, आर्मेनिया, अजरबैजान, बुल्गारिया, हंगरी, इंडोनेशिया, जॉर्डन, कजाकिस्तान, कोसोवो, पाकिस्तान, पैराग्वे, कतर, सऊदी अरब, तुर्की, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), उज्बेकिस्तान और मंगोलिया शामिल हैं।