आधार और वोटर कार्ड जन्मतिथि का पक्का सबूत नहीं- मध्य प्रदेश हाई कोर्ट
क्या है खबर?
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि सेवा मामलों में आधार कार्ड और वोटर कार्ड को जन्मतिथि का पक्का सबूत नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने ये फैसला एक सेवानिवृत्त आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की बहाली से जुड़े मामले में दिया। कोर्ट ने कहा कि ये दस्तावेज खुद की घोषणा के आधार पर बनाए जाते हैं, सिर्फ पहचान के लिए होते हैं और उम्र तय करने के लिए कानूनी सबूत नहीं हो सकते।
मामला
क्या है मामला?
यह याचिका धार जिले की रहने वाली प्रमिला ने दायर की थी। उन्हें हिरलीबाई के सेवानिवृत्त होने के बाद आंगनवाड़ी सहायिका के तौर पर नियुक्त किया गया था। हालांकि, सेवानिवृत्ति के 2 साल बाद हिरलीबाई ने अतिरिक्त कलेक्टर को आवेदन देकर दावा किया कि उनकी जन्मतिथि गलत दर्ज की गई थी। इस आधार पर अपीलीय अथॉरिटी ने सितंबर, 2020 में उन्हें फिर से बहाल करने का आदेश दिया और प्रमिला को नौकरी से हटा दिया।
आदेश
कोर्ट के आदेश की बड़ी बातें
सेवा मामलों में आधार कार्ड और वोटर ID कार्ड को जन्मतिथि का पक्का सबूत नहीं माना जा सकता। कर्मचारी द्वारा स्वीकार किए गए और अंतिम रूप दिए गए सेवा रिकॉर्ड पहचान दस्तावेजों से ज्यादा मान्य होंगे। सेवानिवृत्ति के बाद सुलझे हुए मामलों को फिर से खोलने से अनिश्चितता और तीसरे पक्षों के साथ अन्याय होता है। सेवानिवृत्ति के बाद सेवा कानून में देरी और लापरवाही का सिद्धांत घातक होता है।
टिप्पणी
कोर्ट ने बहाल की प्रमिला की नौकरी
कोर्ट ने याचिकाकर्ता प्रमिला को आंगनवाड़ी सेंटर जमली (अंबापुरा) में आंगनवाड़ी सहायिका के पद पर बहाल करने का आदेश दिया। इसी के साथ सेवा की निरंतरता के साथ मिलने वाले सभी फायदे भी देने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि आधार कार्ड और वोटर ID कार्ड को जन्मतिथि का निर्णायक सबूत नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति एड-हॉक या अस्थायी प्रकृति की नहीं थी, बल्कि निर्धारित दिशानिर्देशों के अनुसार की गई थी।
फटकार
हाई कोर्ट ने अधिकारियों को लगाई फटकार
हाई कोर्ट ने बिना नोटिस या जांच के याचिकाकर्ता की सेवाएं समाप्त करने के लिए अधिकारियों को फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा, "अपीलीय प्राधिकारी को पूरी तरह से पता था कि उक्त पद पर याचिकाकर्ता पहले से ही एक वैध नियुक्ति के तहत कार्यरत थी। इस जानकारी के बावजूद, प्राधिकारी ने उसकी पीठ पीछे अपील का फैसला किया। यह चूक निष्पक्ष प्रक्रिया की जड़ पर प्रहार करती है और आदेश को शून्य बना देती है।"