टीएन शेषन विवाद से लेकर अशोक लवासा की असहमति, चुनाव आयोग में कब-कब सामने आए मतभेद?
क्या है खबर?
देश का चुनाव आयोग एक बार फिर विवादों में हैं। खबरें हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और 2 चुनाव आयुक्तों- सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के बीच मतभेद हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों ने आयोग की कार्यप्रणाली पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज की हैं और उनकी जानकारी के बिना फैसले लेने के आरोप लगाए हैं। ये पहली बार नहीं है, जब आयोग इस तरह के विवादों में हैं। आइए पिछले विवाद जानते हैं।
टीएन शेषन विवाद
आयुक्तों की नियुक्ति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए थे शेषन
1990 के दशक में शेषन के CEC रहते हुए बड़ा विवाद सामने आया था। दरअसल, पहले आयोग में केवल CEC ही होते थे। 1993 में एक अध्यादेश के जरिए आयोग में 2 आयुक्तों की नियुक्ति की गई।
शेषन इस कदम को असंवैधानित बताते हुए इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चले गए।
शेषन ने तर्क दिया कि यह पहले से स्थापित संवैधानिक सिद्धांतों के खिलाफ है और इससे मुख्य चुनाव आयुक्त का अधिकार कम हो गया है।
कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी शेषन की याचिका
सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 1995 में शेषन की याचिका खारिज कर दी।
कोर्ट ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 324 बहु-सदस्यीय चुनाव आयोग की अनुमति देता है और अन्य आयुक्त केवल CEC के सलाहकार नहीं बल्कि सदस्य हैं।
कोर्ट ने कहा, "अगर CEC को सर्वोच्च माना जाए कि उसका फैसला अंतिम होगा, तो चुनाव आयुक्त महज सजावटी पद बन जाएंगे। अनुच्छेद 324 से ऐसा इरादा प्रतीत होना मुश्किल है और न ही इसे संविधान निर्माताओं का इरादा मान सकते हैं।"
नवीन चावला विवाद
चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए CEC ने राष्ट्रपति को लिखा पत्र
जनवरी 2009 में तत्कालीन CEC एन गोपालस्वामी ने चुनाव आयुक्त नवीन चावला को पद से हटाने के लिए राष्ट्रपति को सिफारिश भेजी। चावला पर पक्षपातपूर्ण व्यव्हार के आरोप लगे।
हालांकि, चावला ने आरोपों को खारिज कर दिया और इस्तीफा देने से इनकार कर दिया।
सरकार ने भी CEC की सिफारिश का विरोध किया और राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने सरकार की सलाह पर सिफारिश खारिज कर दी। चावला अपने पद पर बने रहे और अप्रैल 2009 में CEC बने।
अशोक लवासा विवाद
अशोक लवासा ने मतभेद के बाद बैठकों से बनाई दूरी
2019 में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने आचार संहिता के कथित उल्लंघन से जुड़े मामलों में आयोग के फैसलों से असहमति जताई।
लवासा ने मांग की थी कि आयोग के आदेशों में असहमति या अल्पमत की राय भी दर्ज की जाए, लेकिन तत्कालीन CEC सुनील अरोड़ा ने उनकी मांग नहीं मानी।
इसके बाद लवासा ने आचार संहिता के उल्लंघन से जुड़ी सभी बैठकों से खुद को अलग कर लिया था।
ताजा विवाद
अभी क्या विवाद सामने आया है?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त संधू और जोशी ने शिकायत की है कि कई फैसले और आदेश उनकी जानकारी के बिना जारी किए गए।
दोनों ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई है।
जिन मुद्दों पर मतभेद है, उनमें नए मतदाताओं को जोड़ने, मतदाता सूचियों से नाम हटाने, SIR और फॉर्म 6 में बदलाव से जुड़े विवाद शामिल हैं।