क्या भारत-यूरोपीय संघ के बीच FTA समझौता अमेरिका और चीन के लिए है झटका?
क्या है खबर?
भारत और 27 देशों वाले यूरोपीय संघ (EU) के बीच मंगलवार को सालों से अटका मुक्त व्यापार समझौता (FTA) हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर-लेयेन ने नई दिल्ली में इस समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह समझाैता कुछ प्रक्रियाओं के बाद अगले साल से लागू हो जाएगा। यह समझौता दुनिया में भारत के बढ़ते प्रभाव के साथ अमेरिका और चीन के लिए झटके के रूप में देखा जा रहा है। आइए जानते हैं कैसे।
जननी
समझौते को 'सभी व्यापार समझौतों की जननी' क्यों कहा जा रहा?
भारत-EU के बीच FTA को दोनों पक्षों द्वारा 'सभी समझौतों की जननी' कहा जा रहा है क्योंकि इसका उद्देश्य व्यापक आर्थिक लाभ प्रदान करना है। EU और भारत मिलकर दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत GDP, 17 प्रतिशत वैश्विक व्यापार और 25 प्रतिशत से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। इतने बड़े पैमाने पर दो लोकतांत्रिक शक्तियों का आर्थिक गठबंधन पहले कभी नहीं हुआ। इसलिए इसे सिर्फ व्यापार समझौता नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक ढांचा बदलने वाला समझौता कहा जा रहा है।
कदम
भारत और EU ने चीन पर निर्भरता कम करने के लिए उठाया कदम
चीन पर लगातार बढ़ती निर्भरता के बाद यूरोप को एक भरोसेमंद, लोकतांत्रिक और स्थिर साझेदार की जरूरत थी। इसी तरह भारत को एक बड़े, स्थायी और प्रीमियम बाजार की तलाश थी। EU अपनी सप्लाई चेन की मजबूती के लिए इंडो-पैसिफिक में चीन पर निर्भरता कम करते हुए भारत की 140 करोड़ की आबादी वाले तेजी से बढ़ते बाजार तक अपनी आसान पहुंच बनाना चाहता था। इसमें EU और भारत दोनों में रोजगार की संभावनाएं भी थीं।
फायदा
समझौते से क्या होगा फायदा?
इस FTA से भारत में यूरोप की हाई टेक मशीनरी, ऑटोमोबाइल, केमिकल और ग्रीन टेक्नोलॉजी आने का रास्ता बनेगा। वहीं, भारत के श्रम प्रधान उत्पादों (कपड़ा, फार्मा आदि) की मांग भी बढ़ेगी। सही समय पर डिलीवरी और लास्ट माइल लॉजिस्टिक्स को आसान बनाया जा सकता है। इस समझौते से EU और भारत के बीच मांग बढ़ेगी, व्यापार के व्यावधान कम होंगे, यूरोप में नए खरीदार नेटवर्क बनेंगे और इससे दोनों देशों में रोजगार में भी वृद्धि होगी।
प्रभाव
समझौते का कूटनीतिक ताकतों पर क्या पड़ेगा असर?
इस FTA समझौते और भारत के बढ़ते कद का सबसे बड़ा असर कूटनीतिक ताकतों पर पड़ेगा। भारत अब सिर्फ बाजार नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदार बन रहा है। अब अमेरिका, यूरोप, जापान और इंडो-पैसिफिक देशों के साथ उसकी बातचीत का वजन बढ़ेगा। चीन पर निर्भरता घटने से भारत को वैश्विक फैसलों, व्यापार नियमों और सुरक्षा ढांचे में ज्यादा प्रभाव मिलेगा और वह विकासशील देशों की आवाज बनकर नई विश्व व्यवस्था को आकार देने की स्थिति में आएगा।
झटका
चीन को कैसे लगेगा झटका?
एक ही देश पर निर्भरता के दुष्परिणामों ने यूरोप को 'चीन प्लस वन' की नीति पर काम करने के लिए प्रेरित किया। उसे चीन के अलावा एक और बड़ा और भरोसेमंद उत्पादन केंद्र चाहिए था। भारत अपने मजबूत IT और फार्मा सेक्टर के साथ दुनिया की सबसे युवा और सबसे बड़ी आबादी, श्रम बल और लोकतांत्रिक व्यवस्था के चलते यूरोप के लिए सबसे विश्वसनीय विकल्प बन गया। ऐसे में यह समझौता चीन की सप्लाई चेन को तोड़ने का काम करेगा।
प्रभाव
FTA समझौते से कम होगा चीन और अमेरिका का प्रभाव
दुनिया पहले से अमेरिका और चीन पर बहुत अधिक निर्भर है। अब दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर भारत को पूरी दुनिया अमेरिका और चीन से हटकर तीसरे विकल्प के रूप में देख रही है। यह समझौता भारत को इसी तीसरे ध्रुव के रूप में मजबूती देगा और इंडो-पैसिफिक में चीन पर निर्भरता को कम करेगा। बता दें कि भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान क्वाड के जरिए चीन का प्रभाव कम करने में जुटे हैं।
अमेरिका
बातचीत की मेज पर आने को मजबूर होगा अमेरिका
यह समझौता अमेरिका के लिए भी बड़ा झटका है। उसने रूस से तेल खरीद पर भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया और व्यापार वार्ता में भारतीय कृषि उत्पादों पर टैरिफ कम न करने पर अड़ा है। भारत ने EU से FTA कर उसे संदेश दिया है कि वह उसकी धमकियों के आगे नहीं झुकेगा। यह समझौता अमेरिका को भारत के साथ FTA वार्ता को आगे बढ़ाने के लिए भी प्रेरित करेगा। ऐसा होता है तो यह भारत की जीत होगी।