उत्तर प्रदेश की महिलाएं बना रही हैं स्थानीय बायोफर्टिलाइजर, किसानों को होगा फायदा
मानसून का मौसम नजदीक आने के साथ ही कुछ भारतीय किसानों के बीच बायोफर्टिलाइजर की मांग तेजी से बढ़ रही है। इसकी वजह मध्य पूर्व में शिपिंग में आ रही रुकावटें हैं, जिनके चलते केमिकल फर्टिलाइजर की आपूर्ति अनिश्चित दिख रही है। भारत आमतौर पर सालाना लगभग 63 मिलियन टन केमिकल फर्टिलाइजर पर निर्भर रहता है, लेकिन अब बायोफर्टिलाइजर का चलन भी बढ़ रहा है। इसे सरकार का भी पूरा समर्थन मिल रहा है और टिकाऊ खेती पर भी जोर दिया जा रहा है।
उत्तर प्रदेश की महिलाएं बना रही हैं स्थानीय बायोफर्टिलाइजर
उत्तर प्रदेश में तप्पल समृद्धि महिला किसान लिमिटेड जैसे महिलाओं के कई समूह गोबर और अन्य स्थानीय चीजों का इस्तेमाल कर बायोफर्टिलाइजर बना रहे हैं। एक किसान ने बताया कि वे यूरिया का उपयोग लगभग एक-तिहाई कम कर पाए हैं और इससे उनकी फसलों की पैदावार पर कोई बुरा असर नहीं पड़ा। बायोफर्टिलाइजर भले ही केमिकल फर्टिलाइजर का पूरी तरह से विकल्प न हों, लेकिन ये मिट्टी के स्वास्थ्य के लिए पर्यावरण के अनुकूल एक बड़ा सहारा हैं। ये ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने में सहायक होते हैं और जब केमिकल फर्टिलाइजर की आपूर्ति घट जाती है, तो ग्रामीण महिलाओं और छोटे किसानों के लिए एक किफायती और सुलभ विकल्प बन जाते हैं।