
भारत ने सिंधु जल संधि को लेकर विश्व बैंक के फैसले पर उठाये सवाल
क्या है खबर?
भारत ने सिंधु जल संधि (IWT) से जुड़े मुद्दे के समाधान के लिए विश्व बैंक के निर्णय पर सवाल उठाये हैं। विश्व बैंक ने मुद्दे पर दो अलग प्रक्रियाओं में मध्यस्थता कोर्ट और तटस्थ विशेषज्ञ नियुक्त करने का फैसला दिया है।
उसने पाकिस्तान की आपत्तियों के बाद ये फैसला दिया है, जिन पर भारत ने आपत्ति जताई है।
बता दें कि 25 जनवरी को 62 साल पुरानी इस संधि में संशोधन को लेकर भारत ने पाकिस्तान को नोटिस भेजा था।
बयान
भारत सरकार ने क्या कहा?
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा, "मुझे नहीं लगता कि वे (विश्व बैंक) हमारे लिए संधि की व्याख्या करने की स्थिति में हैं। यह हमारे दोनों देशों के बीच एक संधि है और संधि के बारे में हमारा आंकलन है कि इसमें श्रेणीबद्ध दृष्टिकोण का प्रावधान है।"
उन्होंने कहा कि कई सालों से पाकिस्तान संधि का उल्लंघन कर रहा है और इसे लेकर भेजे गए नोटिस का उसे 90 दिनों के भीतर जवाब देना होगा।
आपत्ति
क्या है आपत्ति?
दरअसल, जम्मू-कश्मीर में किशनगंगा और रातले पनबिजली परियोजनाओं के निर्माण के मामले पर पाकिस्तान के आग्रह पर विश्व बैंक ने विवाद के निस्तारण के लिए दो अलग प्रक्रियाएं शुरू की है, जिसे भारत ने IWT का उल्लंघन माना है।
बागची ने कहा कि इस मामले में भारत का रूख बिल्कुल भी नहीं बदला है और भारत मध्यस्थता कोर्ट का कोई सहयोग नहीं करेगा।
उन्होंने कहा कि मामले में सरकार को विश्व बैंक की स्थिति का पता नहीं है।
विवाद
संधि को लेकर कब और क्यों शुरू हुआ विवाद?
इस संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान से बीच साल 1978 से विवाद शुरू हुआ, जब भारत ने पश्चिमी नदियों पर बांध परियोजनाओं का निर्माण शुरू किया। पाकिस्तान ने आपत्ति जताई कि इन परियोजनाओं के निर्माण से नदियों का प्रवाह कम हो जाएगा।
हालांकि, तब यह मुद्दा आपसी बातचीत से सुलझ गया था। साल 2007 में जम्मू-कश्मीर में बगलिहार बांध को लेकर दोनों देश फिर आमने-सामने आए थे और विश्व बैंक ने इसमें मध्यस्थता की थी।
स्थिति
क्या है मौजूदा विवाद?
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान ने 2015 में भारत की किशनगंगा और रातले हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स (HEP) पर कुछ तकनीकी आपत्तियां जताई थीं और इनके निस्तारण के लिए अंतरराष्ट्रीय कोर्ट की मध्यस्थता की मांग की थी। पाकिस्तान की एकतरफा कार्रवाई इस संधि का उल्लंघन है।
भारत सरकार के प्रयासों बाद भी पाकिस्तान ने पांच सालों से स्थायी सिंधु आयोग की बैठकों के दौरान इस मुद्दे पर चर्चा करने से इनकार कर दिया, इसलिए अब नोटिस जारी किया गया है।
नोटिस
भारत ने नोटिस में क्या कहा था?
भारत ने कहा कि IWT को बनाए रखने का वह पूरी तरह से समर्थक है, लेकिन पाकिस्तान की ओर से की गई कार्रवाईयों ने इस संधि के प्रावधानों और उनके कार्यान्वयन पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है।
उसने कहा, "पाकिस्तान द्वारा 2015 में HEP पर आपत्तियों के लिए एक तटस्थ विशेषज्ञ की मांग और फिर 2016 में इस अनुरोध को वापस लेने के बाद मध्यस्थता के लिए कार्ट का रुख करना एकतरफा कार्रवाई है, जो अनुच्छेद (9) का उल्लंघन है।"
संधि
क्या है सिंधु जल संधि?
पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान के बीच 19 सितंबर, 1960 को विश्व बैंक की मध्यस्थता से सिंधु जल संधि हुई थी।
इसके तहत सिंधु घाटी में बहने वाली तीन पूर्वी नदियों (रवि, सतलज, व्यास) पर भारत का, जबकि तीन पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम, चिनाब) पर पाकिस्तान का अधिकार है।
नदियां भारत से होकर बहती हैं, इसलिए पश्चिमी नदियों के 20 प्रतिशत पानी का इस्तेमाल भारत सिंचाई और अन्य सीमित कार्यों के लिए कर सकता है।