सुप्रीम कोर्ट ने कहा- प्रदर्शन के दौरान किसी जगह अनिश्चितकाल तक कब्जा नहीं किया जा सकता
क्या है खबर?
दिल्ली में पिछले महीने हुए प्रदर्शनों से जुड़ी याचिकाओं पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान कोर्ट ने कहा कि कोई भी व्यक्ति विरोध प्रदर्शन करने के लिए किसी जगह पर अनिश्चितकाल तक कब्जा नहीं कर सकता और ऐसे आयोजनों के लिए निर्धारित स्थलों की एक निश्चित समयासीमा होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि प्रदर्शनकारी हर समय कब्जा नहीं कर सकते, क्योंकि किसान, पत्रकार और दूसरे संगठनों को भी विरोध करने का अधिकार है।
टिप्पणी
कोर्ट ने कहा- प्रदर्शन का अधिकार सभी को
सुनवाई के दौरान जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शन स्थल के रूप में इस्तेमाल करने को लेकर बहस हुई।
वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने तर्क दिया कि जंतर-मंतर एक अधिसूचित विरोध स्थल है और वहां प्रदर्शनों के खिलाफ उठाई जा रही आपत्तियों पर सवाल उठाया।
इसके बाद मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने कहा, "विरोध करने का अधिकार सभी को है। इसके लिए एक निर्धारित समय अवधि निर्धारित की जानी चाहिए। कोई भी समूह किसी विशेष स्थान पर अनिश्चितकाल तक कब्जा नहीं कर सकता।"
सरकार
सरकार ने कहा- एक दिन की अनुमति थी, प्रदर्शनकारी नहीं हटे
सरकार के शीर्ष वकील तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि विरोध प्रदर्शन का आह्वान करने वाले किसी भी व्यक्ति को अपने कार्यों के परिणामस्वरूप होने वाले किसी भी परिणाम की जिम्मेदारी लेनी चाहिए।
उन्होंने कहा, "20 जुलाई के विरोध प्रदर्शन की अनुमति केवल एक दिन के लिए दी गई थी, लेकिन प्रदर्शनकारियों ने उस स्थान पर कब्जा कर लिया और यहां तक कि संसद तक मार्च भी किया।"
व्यापारी
व्यापारियों ने भी जताई चिंता
दिल्ली में व्यापारी संघों का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा, "वहां 50 लाख लोग रहते हैं। हमें योजना के बारे में सोचना होगा। अब यहां-वहां जंतर-मंतर जैसी बात नहीं रह गई है।"
रोहतगी ने तर्क दिया कि आसपास के क्षेत्रों में रहने और कारोबार करने वाले लोगों की संख्या को देखते हुए इस मुद्दे को अब केवल एक निर्दिष्ट विरोध स्थल की उपलब्धता पर विवाद के रूप में नहीं देखा जा सकता है।
निगरानी
कैमरों से निगरानी और निजता के अधिकार का मुद्दा भी उठा
पीठ ने प्रदर्शनकारियों की निगरानी और कैमरों के इस्तेमाल से जुड़ी दलीलें भी सुनीं।
वकील प्रशांत भूषण ने निगरानी की प्रकृति और इसे नियंत्रित करने वाले विधायी ढांचे के बारे में जानकारी मांगी।
इस पर सॉलिसिटर जनरल ने पूछा कि क्या सार्वजनिक प्रदर्शन में भाग लेने वाला व्यक्ति ऐसी स्थिति में निजता का दावा कर सकता है?
इसके बाद पीठ ने सार्वजनिक स्थान पर उपस्थिति को दर्ज करने और उस जानकारी का उपयोग आगे के लिए करने के बीच अंतर बताया।