LPG की किल्लत के बीच गोबर गैस से जगमगा रही ग्रामीण रसोई
सप्लाई में देरी और ईरान में चल रहे विवाद की वजह से भारत को द्रवीकृत पेट्रोलियम गैस (LPG) की कमी और लंबी कतारों से जूझना पड़ रहा है। ऐसे में ग्रामीण इलाकों के लोग गाय के गोबर से बनने वाली बायोगैस की ओर दोबारा रुख कर रहे हैं। ये आसान और सब्सिडी वाले सेटअप, खेत के कचरे को खाना पकाने वाली मीथेन गैस में बदल देते हैं। साथ ही इनसे खाद भी मिल जाती है। इसकी मदद से परिवार अपनी रसोई चला पाते हैं और उन्हें सिर्फ गैस सिलेंडरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।
भारत का 2028 तक 5 प्रतिशत बायोगैस का लक्ष्य
गौरी देवी जैसे ग्रामीण बायोगैस का इस्तेमाल हर दिन करते हैं, जबकि LPG को वे इमरजेंसी के लिए रखते हैं। 1980 के दशक से अब तक 50 लाख से ज़्यादा यूनिट लगाए जा चुके हैं। सरकार का मकसद है कि 2028 तक बायोगैस, रसोई गैस (LPG) के कुल इस्तेमाल का 5 प्रतिशत पूरा करे। हालांकि, इसे लगाने की लागत (इंस्टॉलेशन कॉस्ट) और रखरखाव जैसे मुद्दे इसकी रफ्तार को धीमा कर रहे हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि सामुदायिक स्तर पर चलने वाले मॉडल इसमें काफी काम आ सकते हैं। लेकिन फिलहाल, बायोगैस घरेलू खाना पकाने के ईंधन का एक छोटा सा हिस्सा ही है। LPG को ज़्यादा आसान माना जाता है, क्योंकि इसकी सप्लाई चेन का पूरा जिम्मा कंपनियों पर होता है।