आसमान छू रहीं दहेज से जुड़ी मौतें, समाज की चुप्पी क्यों?
एक नई स्टडी से एक चिंताजनक रुझान सामने आया है। भारत में दहेज से जुड़ी मौतों का आंकड़ा 2022 में 6,516 तक पहुंच गया है, जबकि 1988 में यह 1,841 था। यानी इन मौतों की संख्या काफी ज्यादा बढ़ गई है। हालांकि, हैरानी की बात यह है कि इन घटनाओं के खिलाफ लोगों का गुस्सा और विरोध पहले के मुकाबले काफी कम हो गया है। यह हिंसा अभी भी जारी है, लेकिन अब लोग न तो इस पर खुलकर बात कर रहे हैं और न ही पहले की तरह इसमें बदलाव की मांग कर रहे हैं।
दहेज 'एक्सट्रैक्टिव डिमांड' के रूप में बना हुआ
1961 में गैरकानूनी घोषित होने के बाद भी, दहेज प्रथा अभी भी समाज में अपनी जड़ें जमाए हुए है। अब यह जाति, वर्ग और नौकरी के स्टेटस से जुड़ी 'एक्सट्रैक्टिव डिमांड' के रूप में सामने आ रही है। जैसे-जैसे ये मांगें परिवारों और समाज में आम होती जा रही हैं, दहेज से होने वाली मौतों पर लोगों की हैरानी और उनका सार्वजनिक आक्रोश भी धीरे-धीरे कम होता जा रहा है।